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अबोला संवाद

संवाद में हमेशा दोनों पक्षों का बोलना जरूरी नहीं होता। पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों से हमारा संवाद एकतरफा होता है, जहां हम बोलते हैं, वे नहीं। उनका व्यवहार बता देता है कि हमारी बातचीत उन्हें कैसी लग रही है? इसी तरह, जब कोई दुखी हमें आपबीती बताना चाहता हो, तो उसे हमदर्दी और ध्यान से चुपचाप सुनना भी संवादहीनता की स्थिति नहीं कहलाएगी।

दुखी जीव को अक्सर बोलने वाला नहीं, विश्वसनीय श्रोता चाहिए होता है। कई बार मन से हारा हुआ व्यक्ति किसी से बात न कर पाने के कारण आत्महत्या तक कर लेता है। कई बार संवाद रहित सुनने वाला बोलने वाले से ज्यादा मददगार साबित होता है।

बोलने वाले के हाव-भाव और बात करने का सलीका सब कुछ कह देता है। इससे उसकी पृष्ठभूमि, प्रकृति, सब कुछ सामने आ जाती है। इसलिए बातों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ये कभी संबंधों को बेहतर बना देते हैं, तो कभी बिगाड़ देते हैं। कई बार बात करने से बड़े-बड़े मसले हल हो जाते हैं- अंतरराष्ट्रीय समस्याएं भी। सुनने वाला जब पूरे ध्यान से सुनता है, तो सिर्फ सुनता ही नहीं, उसे महसूस भी करता है। जीसस ने कहा था कि दूसरे को आत्मवत समझो। ध्यान व धैर्य से सुनना भी आध्यात्मिक काम ही है।

बहुत से लोगों के संवाद शिकायत के लिए होते हैं। वे उन लोगों की कोटि में आते हैं, जोे यह मानते हैं कि कोई भी भाषा सिर्फ अच्छी बातों के लिए नहीं बनी है। उनकी भविष्योक्तियां, कड़वाहट से बीमार या परेशान आदमी को जीते जी अधमरा कर सकती हैं। ऐसे लोगों को सिर्फ धम्मपद की ये पंक्तियां सुनाई जा सकती हैं- 'अच्छा होता कि हजारों शब्दों की जगह एक शब्द होता, जो शांति लाता। हजारों गानों की जगह एक गाना होता, जो खुशी फैलाता। हजारों कविताओं की जगह एक कविता होती, जो सच्ची खूबसूरती बयां करती।'

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