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विकास के विमर्श में जाति के समीकरण

उत्तर प्रदेश से जैसे ही हम बिहार में प्रवेश करते हैं, अच्छी और आरामदायक सड़कों से गुजरना अच्छा लगता है। उत्तर प्रदेश की ऊंची-नीची, टूटी-फूटी  सड़कों से थोड़ी राहत मिलती है। विकास की इन सड़कों पर स्कूल ड्रेस में साइकिल पर स्कूल जाती लड़कियों का हुजूम दिखाई पड़ता है। कई गांवों में सोलर लाइटें दिखती हैं। उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर बसे बक्सर जैसे छोटे-से शहर में 16-17 घंटे बिजली का होना उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछले दिनों आए फर्क को दिखाता है। आज के संदर्भ में विकास के प्रचलित अर्थ में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य वगैरह की दिशा में बिहार हिंदी क्षेत्र के अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति में आ गया है। किंतु इस विकास को जन आकांक्षाओं के संदर्भ में अगर देखें, तो पाएंगे कि विकास की चाह जन-मन में सदा बढ़ती रही है।

जनतंत्र का प्रसार जनता के भीतर लगातार अच्छे जीवन की उम्मीद और आकांक्षा को बढ़ाता है। जितनी सुविधाएं जनता तक पहुंच चुकी होती हैं, उनसे ज्यादा सुविधा की चाह लोगों के मन में जगती जाती है। यानी विकास जब तक एक सतत प्रक्रिया बनकर नहीं आता और आधारभूत संरचनाओं को एक खास-स्तर पर पहुंचाकर रुक जाता है, तब लोगों के मन में असंतोष पैदा होता है। पिछले दिनों क्षेत्रीय अध्ययन के सिलसिले में बिहार के गांवों में घूमते, लोगों से बात करते हुए यह चीज हर जगह साफ-साफ दिखाई दी। लोग अब तक हुए विकास को स्वीकार करते हैं, लेकिन इसके आगे और विकास चाहते हैं।

बक्सर के पास चौंसा गांव में सड़क, बिजली की स्थिति बेहतर होते हुए भी लोग गरीबी से निजात पाने में सरकार से मदद की अपेक्षा कर रहे थे। गरीबी के बारे में अवधारणा और सोच लगातार बदल रही है। अब गांव के निम्नवर्गीय लोग तो अपने को गरीब कहते ही हैं, मध्यवर्गीय आबादी भी खुद को गरीब कहने लगी है। इसका एक अर्थ तो यह है कि गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ रही है। साथ ही अगर आपको राज्य से मदद चाहिए, तो अपने को गरीब कहना जरूरी हो जाता है। बक्सर में हमें यह सुनने को मिला- नीतीश जी ने काम तो वाकई बहुत किया है, मगर 'गरीबी' का दंश बढ़ता ही जा रहा है। लोग चाहते हैं कि सरकार हमेशा और हर जगह पर उनकी मदद के लिए उपस्थित रहे।

बिहार में विकास का एहसास अनेक दुविधाओं से भरा है। एक तरफ विकास का एहसास है, तो दूसरी तरफ और ज्यादा विकास की चाह, तीसरी तरफ राज्य पर लगातार बढ़ती जा रही निर्भरता की प्रवृत्ति भी दिखाई पड़ रही है। विकास के ऐसे एहसास के बाद जब भी बिहार के गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में 'चुनाव-चर्चा' होती है, तो उसमें 'विकास' गौण हो जाता है और जाति प्रमुख हो जाती है। कौन-सी पार्टी अच्छा करेगी? किसका जनाधार मजबूत है? कौन किसे वोट देगा? ये सारी व्याख्याएं जाति के आधार पर होती हैं। इन विषयों पर जो फोकस गु्रप परिचर्चा हम लोगों ने आयोजित की, उसका अगर सार निकाला जाए, तो समझ में आता है कि लोग मानते हैं कि नीतीश कुमार ने बिहार के लोगों में नया आत्म विश्वास पैदा किया है, बड़े भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगा है, लेकिन छोटे-छोटे भ्रष्टाचार बढ़े हैं। लोगों की सरकार से नौकरी पाने की आकांक्षा पूरी नहीं हुई है। यानी नीतीश कुमार की छवि बिहार में साफ-सुथरी और विकास पुरुष वाली है। इस छवि के बावजूद जब उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के पक्ष में वोटे देने की बात होती है, तो लोग समीकरण जोड़ने लगते हैं- कितने महादलित उनके साथ जा सकते हैं, कितने अति पिछडे़ और कितने अल्पसंख्यक, वगैरह।

लालू यादव की स्थिति नीतीश कुमार के बिल्कुल विपरीत है। ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है, जो यह मानते हैं कि बिहार के प्रगति न कर पाने का बड़ा कारण खुद लालू प्रसाद यादव हैं। इसके बावजूद जातिगत समीकरण के कारण उनको राजनीतिक रूप से मजबूत माना जाता है। धारणा यह है कि यादव जाति के साथ ही बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता अब भी उनके साथ हैं। जो लोग यह मानते हैं कि नीतीश कुमार बहुत अच्छे मुख्यमंत्री हैं, उनकी सोच भी यही है कि बिहार में बिना लालू यादव से जुड़े नीतीश नहीं जीत सकते। किसके वोट किस तरफ जाएंगे, यह अभी पूरी तरह नहीं कहा जा सकता, लेकिन चुनाव को जातिगत समीकरण से देखने वाले यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अगड़ों के अलावा और किन जातियों को अपने साथ जोड़ पाती है।

इस विमर्श में एक और चर्चा है- जीतन राम मांझी फैक्टर की। सभी महादलितों के वोट उनके पक्ष में पड़ेंगे, ऐसा कोई नहीं कह रहा है। लेकिन यह जरूर माना जा रहा है कि मुसहर जाति के वोटों का एक अच्छा-खासा भाग उनके पक्ष में जा सकता है। बिहार के लगभग 19 महादलित जातियों में मुसहर पिछले दिनों एक सक्रिय राजनीतिक जाति के रूप में उभरी है। लालू-नीतीश के सामाजिक न्याय के नारों के बीच इस जाति का राजनीतिक रूपांतरण तेजी से हुआ है। कई विधायक, पंचायत प्रधान, सामाजिक नेता इस जाति से उभरे हैं। लेकिन यह जाति अकेले अपने दम पर विधानसभा सदस्य जिताने का संख्या बल नहीं रखती। इसलिए इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि यह फैक्टर बाकी जातियों के साथ अपने चुनावी समीकरण को किस तरह विकसित करता है।

जातियों के इन चुनावी समीकरणों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उनका आकलन हम अक्सर राज्य और राष्ट्र के स्तर पर करते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर मतदान कई बार इस आधार पर नहीं होता। मतदान किस तरह से होगा, यह बहुत बार निर्वाचन क्षेत्र के स्थानीय समीकरणों से ही तय होता है। कई बार यह इस बात से तय होता है कि किस पार्टी ने वहां किसे टिकट दिया है। इसमें स्थानीय एलीट भी अपनी भूमिका तय करते हैं और मतदाता भी राज्य-स्तरीय विमर्श के साथ स्थानीय जरूरतों व  दबावों में संतुलन साधने का प्रयास अपनी तरह से करते हैं। मुख्यधारा के विमर्श से बाहर रहने वाले छोटे दल भी अक्सर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मसलन, वामपंथी दलों को लें। बिहार के तकरीबन हर निर्वाचन क्षेत्र में एक निश्चित संख्या में उनके समर्थक हैं। कई निर्वाचन क्षेत्रों में तो उनके मत निर्णायक हो सकते हैं।

भारत में जनतंत्र विरोधाभासों से भरा है। एक तरफ उसमें विकास की प्रतिबद्धता, समानता की चाहत है, तो दूसरी तरफ इसके निर्माण की प्रक्रिया में जाति, धर्म और अस्मिता से प्रभावित जनमत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जा रही है। एक ही जनमत के लिए कभी विकास महत्वपूर्ण हो जाता है, कभी जाति और धर्म। कभी विकास और जाति-धर्म साथ-साथ महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह अंतर्विरोध बिहार में साफ-साफ देखा जा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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