DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सोशल मीडिया से पाठक तक पहुंचती किताबें

कुछ दिनों पहले चर्चित लेखक भगवान दास मोरवाल ने अपने उपन्यास नरक मसीहा के बहाने साहित्य के फेसबुकिया संसार के समक्ष शिकायत दर्ज कराई कि हिंदी का साहित्य पाठक तक नहीं पहुंच पा रहा है और इसके लिए प्रकाशक जिम्मेदार हैं। उन्होंने किताबों को सीमित दायरे में कैद कर दिया है। मोरवाल की इस टिप्पणी पर सहमतियों-असहमतियों के साथ ठीक-ठाक बहस चली। लेकिन असल सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि संकट वाकई पाठक का है या पाठक तक न पहुंच पाने का। मोरवाल की टिप्पणी और उस पर चली बहस का अगला सिरा है चर्चित लेखिका अलका सरावगी की हालिया फेसबुक पोस्ट, और उस पर आई टिप्पणियां और फिर उन पर दिए गए जवाब। ऐसे समय में, जब हिंदी साहित्य जगत पाठकों का टोटा होने का रोना रोता रहा हो, इस तरह के हस्तक्षेप का स्वागत होना चाहिए। इसने बहस को एक नया आयाम दिया है कि असली संकट पाठक का नहीं है, किताबों के पाठक तक न पहुंचने का है।

अलका सरावगी की यह फेसबुक पोस्ट उनके नए उपन्यास जानकीदास तेजपाल मैनशन की चर्चा से जुड़ी है। इस पोस्ट पर कमेंट के रूप में आई तमाम टिप्पणियों में किताब उपलब्ध न होने की शिकायत थी। अलका ने ऐसे पाठकों से अपने ई-मेल एड्रेस और इनबॉक्स पर उनका नाम और पता लिया इस वायदे के साथ कि उन्हें किताब वीपीपी के जरिए मिल जाएगी। अलका का यह फेसबुक संदेश मुंबई, रांची, वर्धा से लेकर आरा, सीतापुर, गाजीपुर और गुप्तकाशी, त्रिचूर, नैहाटी जैसे छोटे व सुदूरवर्ती शहरों तक पहुंचा। सभी जगहों से पाठकों की जिज्ञासा यही थी कि किताब उनके शहर में कहां मिलेगी? खैर उनके प्रयास से यह उपन्यास ऐसे 200 से ज्यादा पाठकों तक पहुंच चुका है। पाठकों की यह जिज्ञासा और लेखिका के प्रयास का यह अनूठा उदाहरण बताता है कि संकट पाठक के होने, न होने का नहीं है, वरन साहित्य के पाठक से दूर होते जाने का है। यह दूरी उस कारोबारी मायाजाल के कारण बनी है, जिसकी रुचि साहित्य के 'बाजार' में तो है, मगर पाठक में नहीं।

इसके पहले अखिलेश के उपन्यास निर्वासन  की फेसबुक पर चर्चा होते ही उसकी ऑनलाइन डिमांड बढ़ चुकी है और मंतव्य  जैसी नई पत्रिका फेसबुक पर नए ग्राहक जोड़ लेती है। राजकमल और वाणी जैसे प्रकाशन भी अब इस सच को स्वीकार रहे हैं। राजकमल अब अपने प्रकाशनों की समीक्षाएं सोशल मीडिया पर शेयर कर रहा है, तो वाणी ने विदर्भ के किसानों की त्रासदी पर संजीव के नए उपन्यास फांस की फेसबुक पर चर्चा चलाई। शायद यह बहस हिंदी के लेखक और पाठक को उसकी बेचारगी से बाहर निकालने का एक रास्ता दे जाए। अंग्रेजी संसार से निकले चमकदार नामों की किताब आने से पहले ही ग्लोबल मार्केटिंग की आलोचना करने वाले हिंदी साहित्य लोक को इसे एक कारगर हथियार के रूप में लेना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सोशल मीडिया से पाठक तक पहुंचती किताबें