DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चीजों का मूल्यांकन

छोटी-सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उनकी आदत है। पेश करना ही नहीं, समझना भी। वह अक्सर तिल का ताड़ बना देते हैं और तिल को ताड़ समझ भी लेते हैं। इसीलिए अब लोगों ने उन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है। आखिर उनके एक शुभचिंतक ने समझाया, जब कोई बात या स्थिति बुरी लगे, तो ठहरो, अपनी चेतना को निष्क्रिय कर दो। प्रतिक्रिया या तो दो ही मत या बस 30 सेकंड ठहरकर दो। बढ़ा-चढ़ाकर चीजों को पेश करना आज महामारी की तरह है। यह क्यों हमारी दुनिया पर हावी हो रही है? मशहूर फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक एमाइल कुए कहते हैं कि आप जब भी कोई बड़ा काम करना चाहते हैं, तो आपकी इच्छाओं और कल्पना में संघर्ष होता है। इच्छाएं कहती हैं कि ऐसा करो और कल्पनाएं कहती हैं कि नहीं। कल्पनाएं आपको डराती हैं। कुए कहते हैं कि दोनों के संघर्ष में अक्सर कल्पनाओं की जीत होती है। चीजों का सही मूल्यांकन नहीं कर पाने का एक बड़ा कारण इनके बीच का अंतर्संघर्ष है।

कल्पनाओं को हराने का एक तरीका भी कुए सुझाते हैं और वह है प्रार्थना करना। प्रार्थना असफलताओं से उबरने के लिए आपको इच्छाशक्ति से लबरेज करती है। जैसे ही आप इच्छाशक्ति का एक स्तर हासिल करते हैं, आप मूल्यांकन का तरीका खुद-ब-खुद सीख जाते हैं। हालांकि अगर ऐसा नहीं है, तो यह भी हर स्थिति में बुरा नहीं। ऐसे रिसर्च भी हैं, जो इसे बेहतर मानते हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध मनोविज्ञानी जो फोरगस का मानना है कि यह एक नकारात्मक मनोदशा है। लेकिन यह ऐसी मनोदशा भी है, जो विचारात्मक शैली उत्पन्न करती है। यह विस्तृत और चौकस होती है, जो बाहरी वातावरण की मांगों पर अधिक ध्यान देती है। तो हम क्या करें? जवाब भी फोरगस देते हैं। कहते हैं कि चीजों के मूल्यांकन में कभी-कभार थोड़ी-बहुत गड़बड़ी जरूर करें, लेकिन इसे हावी नहीं होने दें।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:चीजों का मूल्यांकन