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जैविक खेती से बदली जिंदगी

यह कहानी है जयप्पा की, जो कृष्णागिरी जिले में तली गांव के रहने वाले हैं। उनके पास तीन एकड़ जमीन है। वह 15 साल से अपने खेत में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते। पूरी तरह जैविक खेती करते हैं, जो प्राकृतिक व केंचुआ खाद पर आधारित है। 65 वर्षीय जयप्पा पहले रासायनिक खेती करते थे, पर उनके जीवन में तब नया मोड़ आया, जब उन्हें बेंगलुरु के कृष्णा प्रसाद मिले। देशी बीज मेला और कृषि मेला के जरिए जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कृष्णा प्रसाद की कीर्ति फैल चुकी है। 1998 की बात है। एक शाम जयप्पा के गांव में कृष्णा प्रसाद आए।

उनकी नजर जयप्पा के घर रखे कद्दू पर पड़ी। वह मंतू कद्दू (स्थानीय नाम) देशी था और बाकियों से अलग था। उनकी पारखी नजर ने उसे पहचान लिया। वहां से लौटकर कृष्णा प्रसाद ने कद्दू के बारे में लेख लिखा और उसमें जयप्पा का पता दिया। कुछ ही दिनों में जयप्पा के पास चिट्ठियों का तांता लग गया और लिफाफे में अतिरिक्त डाक टिकट भी लोगों ने भेजे और इन डाक टिकट के बदले में कद्दू के बीज मांगे, क्योंकि इतनी कम राशि का मनीऑर्डर करना उचित नहीं था। एक कद्दू में करीब 750 बीज निकले। इन बीजों के बदले जयप्पा को 360 रुपये के डाक टिकट प्राप्त हुए। उसने वापसी डाक से लिफाफे में एक-एक, दो-दो बीज सबको भेज दिए और जो डाक टिकट उसे मिले थे, उन्हें कृष्णा प्रसाद को भेज दिए, जिन्हें उन्होंने ऑफिस के कामकाज में इस्तेमाल कर लिया। आगे की कहानी एक मिसाल है।
इंडिया वाटर पोर्टल में बाबा मायाराम

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