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प्राकृतिक आपदा, प्रशासनिक विपदा

भूल जाने की पूरी तैयारी है। गांवों के जख्म अभी भरे भी नहीं हैं, लेकिन सरकार ने अध्याय बदल दिया है। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी के बाद सरकार की चिंता यहीं तक थी कि किसी तरह बद्री-केदार यात्रा का सिलसिला फिर से शुरू हो जाए, तो उसे मुक्ति मिले। सरकार ने इसे ही अपना सबसे बड़ा काम माना और वह पूरी तरह से जुट गई। यात्रा किसी तरह थके-हारे शुरू हो ही गई। भगवान के भक्त सुविधाओं के अभाव में भी उनके दर्शनों के लिए टूट ही पड़ते हैं। वैसे इसमें सरकार अपनी पीठ भी थपथपा ले, तो कोई बुराई नहीं है।

दो वर्ष बीत जाने के बाद भी पीड़ित गांवों के हाल नहीं बदले हैं। जो हुआ, वह भयावह था, पर जो भविष्य है, वह पूरी तरह से अनिश्चित है। इस भीषण त्रासदी ने पूरे देश को बुरी तरह झकझोर दिया था। जो कुछ घटा था, वह अविश्वसनीय था। चंद घंटों में हजारों लोगों का अपनी जान से हाथ धो बैठना और उत्तराखंड के सैकड़ों गांवों की तबाही एक ऐतिहासिक घटना बन गई थी। देश स्तब्ध था। सभी ने मुक्त हृदय से सहायता पहुंचाई। सरकारी सहायता तो जो भी रही, पर सैकड़ों करोड़ रुपये उत्तराखंड सरकार को गांवों की उजड़ी दुनिया को फिर से बसाने के लिए प्राप्त हुए। दो साल पूरे हुए, पर यह मदद आज भी उन गांवों तक नहीं पहुंच सकी है।

अब तो उम्मीदें भी खत्म चुकी हैं। कैग की रपट देखिए, जिसने आपदा से प्रभावित ऐसे 436 गांवों की पड़ताल की, जहां जनसंख्या 3,260 थी। पता चला कि 21 गांवों में राहत पहुंची ही नहीं और 22 गांव पूरी तरह से निराश थे। इसमें यह भी कहा गया कि पुनर्वास के लिए 100 गांव चिन्हित किए गए थे। दो साल बीत गए, लेकिन उनका सर्वे तक पूरा नहीं हो सका। कई लोग आज भी क्षतिग्रस्त मकानों में रहने का जोखिम उठा रहे हैं। कैग की यह विस्तृत रिपोर्ट सरकार के पुनर्वास के दावों की पोल खोलती है। रपट में यह भी कहा गया कि जिम्मेदारी निभाई गई होती, तो आपदा में तबाह 31 गांवों को बचाया जा सकता था। जबकि ये गांव अति-संवेदनशील श्रेणी में आते थे। इसी तरह, राहत और पुनर्वास से जुड़े तमाम मुद्दे सरकार की प्राथमिकता नहीं बन पाए। आपदा के बाद सरकार का मुख्य फोकस यात्रा को फिर से चालू करना था। इसी को लेकर सारा तंत्र चिंतित था और व्यवस्था में लगा था। स्थानीय दायित्वों के प्रति काहिली का यही सबसे बड़ा कारण सिद्ध हुआ।

त्रासदी के बाद तमाम गांवों में छोटे-छोटे आंदोलन भी शुरू हुए। कहीं पुल नहीं बन सका, तो कहीं खेत आज भी उजड़े हैं। पर इन आंदोलनों से भी किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगी। ये सारे गांव आज भी वहीं खड़े हैं। आज भी इन गांवों में सिर्फ एक चीज है- भय। कैग ने अपनी रपट में यह भी कहा कि सरकार गांवों को भयमुक्त रखने में भी असफल रही है। हां, इस भय के चक्कर में कुछ लोगों की राजनीति जरूर चमकी है।
ऐसा तो हमेशा ही हुआ है। लोग त्रासदी और उसके पीड़ितों को भूल जाएं, उसके लिए कदम उठाने ही पड़ते हैं। प्रशासन जानता है कि ऐसे किसी मुद्दे पर जनमानस को ज्यादा देर तक अटकाए नहीं रखा जा सकता। इसके खतरों के प्रति वह पूरी तरह सचेत है। इस त्रासदी के बाद जो कुछ भी हुआ, वह व्यवस्था के चरित्र और उसकी संवेदनहीनता का बड़ा खुलासा करता है। पीड़ितों की सेवा के लिए पहुंची सहायता व धन कहां-कहां किस तरह खर्च हुआ, इसका खुलासा एक आरटीआई से हुआ,और  इससे कहीं बड़ा भ्रम पैदा हो गया कि क्या आपदा में सरकारी तंत्र ज्यादा पीड़ित था, जिसने इस सहायता की भरपूर राहत लेकर मौज उड़ाई? जिस तरह से खर्चे का ब्यौरा सामने आया, वह एक शर्मनाक बात है, जो हमें उन लाखों-करोड़ों लोगों के आगे शर्मिंदा करती है, जिन्होंने अपनी कई आवश्यकताओं की बलि चढ़ाकर सामथ्र्य के अनुसार सहायता दी थी। इस खुलासे से भले और कुछ न हुआ हो, लेकिन देश भर में बैठे उन लोगों के हौसले जरूर हिले होंगे, जिन्होंने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जी खोलकर मदद की थी।
हम अगर व्यवस्था पर विश्वास रखते हैं और उसे बनाने में हमारी भागीदारी भी है, तो शायद उसे सुधारने की पहल भी हमें ही करनी पड़ेगी। हर बात को सरकार के जिम्मे छोड़कर और उस पर सारे आरोप थोपकर हम अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकते। आज परिस्थितियां इस तरह बिगड़ चुकी हैं और बेलगाम हो गई हैं कि सुरक्षा और विश्वास की कोई जगह नहीं बची है। बड़ी निराशाओं ने हमें घेर लिया है, क्योंकि अब किसी विपदा में सरकारी साथ नहीं दिखाई देता, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण केदारनाथ त्रासदी के ही रूप में सामने है, जहां पीड़ितों के जख्मों पर मरहम तो न लग सका, मगर उन्हें कुरेदा जरूर गया है। जिस तरह से राहत राशि की लूटपाट हुई है, वह  तो इसी तरफ इशारा करती है कि हम कुदरती आपदाओं और पीड़ितों की पीड़ा को न सिर्फ हल्के में लेते हैं, बल्कि इन्हें अपनी स्वार्थ सिद्धि का मौका मान लेते हैं।

अब दो बड़ी चिंताएं हमारे सामने हैं। एक तो आने वाली आपदाओं की बढ़ती आशंका और दूसरी, त्रासदी के बाद की सहायता में कोताही व लूटपाट। इन दोनों ही मोर्चों पर सरकारी तंत्र की पूरी असफलता दिखाई देती है। त्रासदियां तो हमेशा से आती रही हैं, और इनका खतरा उत्तराखंड जैसे राज्यों पर हमेशा से ही मंडराता रहा है। हम इनको रोक तो नहीं सकते, लेकिन ऐसी व्यवस्था जरूर बना सकते हैं, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनसे बचा सके। आपदा पीड़ितों को काफी हद तक पीड़ा से मुक्ति दिला सके। लेकिन यही वह मोर्चा है, जिस पर हमारी असफलता साबित हो चुकी है। गांवों की पीड़ा हमसे दूर है, उनकी सुनवाई की कोई जगह भी नहीं है। ऐसे में, सटीक पहल की जरूरत महसूस की जानी चाहिए। बार-बार की त्रासदी और बेपरवाह तंत्र आने वाले समय में बड़ी अराजकता को जन्म दे सकता है।

आपदाओं के संदर्भ में एक बात और महत्वपूर्ण है कि हम अगर वंचितों और पीड़ितों से मुंह मोड़ लेंगे और उनके हक का भी दुरुपयोग करेंगे, तो निश्चित ही हमें नरके जाने केलिए परलोक नहीं जाना पड़ेगा। वह यहीं, इसी धरती पर मिल जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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