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कदर उल्लू की उल्लू जानता है

भारतीय रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर ने ‘अर्थ’ की निगरानी के संदर्भ में कभी कहा था- न तो हम बाज हैं, न ही फाख्ता, हम तो उल्लू हैं। सचेत रहते हैं उस वक्त भी, जब बाकी आराम फरमाते हैं। राजन साहब जो चाहे कहें, भारतीय जनमानस में उल्लू बुद्धि का पर्याय होता, तो टीवी निहारने वालों को नो उल्लू बनाइंग सरीखा लयात्मक पाठ न पढ़ाया जाता। उल्लू को लेकर जो आम धारणा है, उससे सोचना पड़ता है कि यह रात्रि-चर बेवकूफी का प्रतीक है अथवा और कुछ।

किसी को काठ का उल्लू कहिए, तो गाली के रूप में लेगा। निरा उल्लू कहिए,तब भी बहुत नाराज नहीं होगा, पर अगर किसी को उल्लू का पट्ठा कह दीजिए, तो बावेला मच जाएगा। सामान्यत: ‘पट्ठा’ शब्द जवान के लिए प्रयुक्त होता है, लेकिन उल्लू के साथ जुड़कर वल्दीयत बदलने लगती है। कवि उमाकांत मालवीय प्रसिद्ध साहित्यकार लक्ष्मीकांत वर्मा से अक्सर आग्रह करते- मुंशी,आप मुझे गोद ले लीजिए। आशय ‘एडॉप्ट’ करने से रहता। जब मुलाकात हो, एक ही टेर कि लिखा-पढ़ी करके मुझे गोद ले लीजिए। वर्मा जी कहते- उमा, इतनी आत्मीयता क्यों? विनोदी उमाकांत जी ने एक दिन जवाब दे ही दिया- ताकि लोग मुझे उल्लू का पट्ठा कह सकें।

उल्लू जिसे अंग्रेजी में आउल कहते हैं, उसका पट्ठा होना अत्यंत अपमानजनक है। कवि भारत भूषण अग्रवाल की पीड़ा देखें- मैं जिसका पट्ठा हूं, उस उल्लू को खोज रहा हूं। डूब मरूंगा जिसमें, उस चुल्लू को खोज रहा हूं।  कहते हैं कि रवि ठाकुर के भतीजे दर्शन के विद्वान सोमेन ठाकुर ने जीवंत उल्लू पाल रखा था। एक दिन हिम्मत जुटा रवि ठाकुर ने कह दिया-सोमेन, एई बाड़ी दुइए उल्लू ना थाकिबे (इस घर में दो उल्लू नहीं रह सकते)। इसकी मनहूसियत पर शौक बहराइची का शेर मशहूर है-बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है/ हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा।  यहां पर एक और शेर याद आ रहा है- कदर उल्लू की उल्लू जानता है, उमा को कब चुगद पहचानता है। हे प्रभु, अगले जन्म में मुझे उल्लू बनाना। इस जनम में तो यह ठेका माननीयों ने ले रखा है।
अशोक संड

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  • Web Title:कदर उल्लू की उल्लू जानता है