DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मौन का संगीत

इन दिनों हमारे पास तरह-तरह के गैजेट्स हैं। घर हो या ऑफिस या सफर में आते-जाते हर वक्त हमारे हाथों में कभी मोबाइल फोन या लैपटॉप या आईपैड होता है। पहले आप सफर के दौरान बगल की सीट पर बैठे यात्री से बातचीत कर लेते थे। लेकिन इन गैजेट्स के हमारे जिंदगी में शामिल हो जाने से वह अनौपचारिक बातचीत अब लगभग बंद हो गई है। हम सोचते हैं कि हमें ईयर फोन में गाने सुनकर या चैटिंग करके सुकून मिल जाएगा। इन कामों में जुबान खामोश होते हुए, दिमाग बातें करता रहता है। इस सबसे तनाव उपजना स्वाभाविक है। साथ ही हमारे आस-पास का माहौल भी तनावपूर्ण बन जाता है। इस स्थिति के लिए हम खुद जिम्मेदार होते हैं, लेकिन हमेशा दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। हम उस मौन से दूर हो जाते हैं, जो दिनचर्या  का हिस्सा होना चाहिए।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अक्सर ‘मौन व्रत’ रखते थे, ताकि अपनी आंतरिक शक्ति को संचित कर सकें। ‘ओशो’ तो मौन को सबसे बड़ा नाद योग मानते थे। जबकि, मनोवैज्ञानिक सैमुअल जॉनसन मानते हैं कि जो जिंदगी की छोटी-छोटी परेशानियों और तनाव में आकर खुद को उलझा लेते हैं, वे अपनी जिंदगी को बिना पतवार की नाव बना देते हैं। लेकिन बुद्धिमान वह है, जो अपनी वाणी की एकलयता और शांति से अपना सब कुछ गंवाने से बचा लेता है। यह है इंसान का मौन। कहते हैं कि हम जो अच्छा या बुरा बोलते हैं, वैसा ही पहले मन में सोचते हैं। अपनी वाचालता के कारण समय-कुसमय का विचार न करके हर समय कुछ-न-कुछ बोलते रहते हैं। ‘मौन’ से वाणी और मन, दोनों को शांति मिलती है। मौन दो प्रकार का होता है- एक तो जबान से कुछ भी उच्चारण न करना और दूसरा मन की गति को भी रोक देना। जीभ से कम बोलने की आदत धीरे-धीरे बनानी पड़ती है। लेकिन मन को काबू में रखना सबसे कठिन है, पर यही सबसे जरूरी है।

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मौन का संगीत