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विदा हुईं शीला कौल

शीला कौल के जाने से नेहरू युग का एक पुरोधा चला गया। शीला जी पंडित नेहरू की सलहज थीं और इसी नाते इंदिरा गांधी की मामी। वह नेहरू जी की भी दुलारी थीं। उनके पति कैलाशनाथ कौल नेहरू जी के विवाह के समय आठ साल के थे और यह छोटा साला नेहरू जी को बड़ा प्रिय था। वह सदैव नेहरू का अनुगामी रहा और उसकी पत्नी भी। मेरी उनसे एक मुलाकात थी और वह भी अपने मित्र संतोष तिवारी की बदौलत। हुआ यह कि 1976 या 77 में तिवारी जी ने योजना  पत्रिका में कानपुर के चंद्रशेखर कृषि विश्वविद्यालय पर एक स्टोरी की। तब कैलाशनाथ जी वहां के वीसी थे। उन्होंने तिवारी जी को अपने आवास पर बुलाया। तिवारी जी मुझे भी ले गए। हम वहां उनके बैठके में बिठाए गए। थोड़ी देर बाद एकदम नेहरू जी जैसी आकृति के गोरे-चिट्टे सज्जन कमरे में घुसे और बोले- नमस्कार। हम उनकी भव्यता देखकर खड़े हो गए। वह बोले- मैं कौल हूं। तब पता चला कि वीसी साहब यही हैं। उन्होंने वह पत्रिका उलटी-पलटी और हमसे बोले कि अपनी स्टोरी हमें पढ़कर सुना दो। हमने पढ़ी, उसमें कई जगह उनकी आलोचना भी थी। पर वह खुशदिल इंसान थे, क्षुद्र दिमाग वाले नहीं।... कौल साहब पहले ही चले गए थे और अब शीला जी। शीला जी कई बार केंद्रीय मंत्री रहीं, राज्यपाल रहीं, पर मरते समय बेटी के पास गाजियाबाद आ गईं, जो खुद यूपी काबीना में रह चुकी हैं। वहीं उनका निधन हुआ। इस तरह, नेहरू की पीढ़ी का उस परिवार में एकमात्र बचा सदस्य चला गया।
शंभुनाथ शुक्ल की फेसबुक वॉल से

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