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आसमान ताकते हुए इंसान

मौसम विज्ञान ने गजब की तरक्की की है। फिर भी किसान आसमान ताक रहे हैं। साथ ही, इंसान ने प्रगति की है, वरना आज तक खेती भगवान भरोसे क्यों रहती? जहां पहले सत्ताधारी दाल में नमक बराबर खाते थे, इधर जी भरकर खाते हैं। जहां सरकारी दस्तावेज में नहरें हैं, वहां जमीन पर पेड़ों के ठूंठ हैं। पता नहीं, नहर के पैसों को कौन-सा चुनाव निगल गया? कुछ को शक है कि नहर सत्ता दल के प्यासे पेट में समा गई, कुछ को विश्वास है कि तत्कालीन मंत्री के। हालात ये हैं कि विकास की हरियाली की जगह कुछ खर-पतवार भी नजर आ जाएं, तो उस सरकार की ईमानदारी के गुण गाए जाते हैं।

मौसम विभाग की सूखे की भविष्यवाणी से ऐसे लोगों की बांछें खिली हैं, जो प्राकृतिक आपदा में कमाई के आदी हैं। यही वह मौका है कि जब पंडितों, जमाखोरों और मुनाफाचोरों की चांदी है। हर राष्ट्रीय संकट उनके अच्छे दिनों का आना है। पंडितों का दावा है कि विज्ञान से भगवान की पहुंच कहीं ज्यादा है। यज्ञ, हवन, दान, दक्षिणा से वे ऊपर वाले को पटाने में समर्थ हैं। देवता की कल्पना इंसान के व्यवहार और चिंतन का प्रगटीकरण है। तभी पंडितों को यकीन है कि धरती का हर काम जब करप्शन से होता है, तो आकाश का काम चढ़ावे की घूस से क्यों नहीं होगा? संकट चाहे कुदरती हो या स्वास्थ्य संबंधी, उसका इकलौता निदान उनके अनुसार आसमान ताकना है। वे जानते हैं कि उनके सक्रिय और खर्चीले सहयोग के बिना ऊपरी इनायत की ख्वाहिश आधा-अधूरा अभियान है।

जमाखोरों व मुनाफाचोरों का भरोसा विज्ञान व भगवान, दोनों पर है। दफ्तर का कंप्यूटर-कर्मी खाद्यान्न की कीमत, उपलब्धता और मौसम पर नजर रखता है। घर का पंडित पोथी बांच फसल के अनुमान पर। जनता को ये जितना चूना लगाते हैं, उसी अनुपात में मंदिर बनवाते हैं। इसके कई फायदे हैं। ख्याति जमाखोर की नहीं, समाज और धर्मसेवक की है। कई को इनकी लुप्त इंसानियत में देवत्व दिखता है। अपराध बोध के पारंपरिक प्रायश्चित से इनके मन में कुछ ऐसा मुगालता है। इसी उम्मीद से सूर्य नमस्कार करते पाए जाते हैं।

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