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भटकी हुई चिट्ठियां

कुछ चिट्ठियां कभी सही पते पर नहीं पहुंच पातीं। वे भटकने के लिए अभिशप्त होती हैं। चिट्ठी अगर लेट हो गई, तो फिर उसकी कीमत घट जाती है, कई बार तो खत्म हो जाती है। पिछले दिनों एक ऐसी ही चिट्ठी मिली। मंजिल से दूर और वक्त से छिटकी हुई। मैं नहीं जानता कि वह मुझे जहां मिली, वहां तक पहुंची कैसे? मेरा दिल है कि आपको उसके बारे में बताऊं। नौ साल पहले बंगाल के मालदा से लिखी गई वह चिट्ठी एक रिटायर्ड रेलवे कर्मचारी की बेटी सौमित्रा (बदला हुआ नाम) ने लिखी थी।

चिट्ठी से मालूम पड़ता है कि साढ़े 17 साल की सौमित्रा जवां सपनों से भरपूर एक जिंदादिल लड़की है। टूटी-फूटी अंग्रेजी में उसने 25 मार्च, 2006 को वह पाती अभिषेक बच्चन को लिखी है। सौमित्रा अभिषेक को बेहद प्यार करने का दावा करने के साथ शादी करने की जल्दी में है। इसके पीछे एक वजह वह जतींद्र बनर्जी (बदला हुआ नाम) भी है, जिसे सौमित्रा के पिता उसके लिए पसंद कर चुके हैं।... खत के आखिर में वह अभिषेक को बताती है कि वह अपने दिल की बातें खून से लिखना चाहती थी, मगर क्या करे, उसे सुई से डर लगता है। मैं जहां खड़ा होकर उस चिट्ठी को पढ़ रहा था, 'जलसा' वहां से तकरीबन आठ किलोमीटर दूर है। यह चिट्ठी मंजिल पर पहुंच नहीं सकी। हर चिट्ठी के पहुंचने के बाद एक अलग कहानी उपजती है। बहरहाल, नहीं मालूम कि उस लड़की का क्या हुआ? मूंछों वाले जतींद्र से वह बच भी सकी या अब वही उसका 'अभिषेक बच्चन' है।
आईबीएन खबर में नितिन ठाकुर

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