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आत्म-सम्मान के लिए ऑपरेशन

इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह होता तो सच का रोजनामचा है, पर सटीक तथ्यों तक पहुंचने के लिए उसे तर्कों की भूल-भुलैया से गुजरना पड़ता है। म्यांमार में पिछले दिनों हुआ सैन्य ऑपरेशन इसकी मिसाल है। पिछली चार जून को मणिपुर में आतंकवादियों ने घात लगाकर सेना के 20 जवानों को शहीद कर दिया। कुछ महीनों से जिस तरह मणिपुर और नगालैंड में आतंकवादी वारदातों की खबरें मिल रही थीं, उनसे लगातार बड़े अपशकुन का एहसास हो रहा था। इस हत्याकांड ने हुक्मरानों के माथे पर शिकन गहरी कर दी। तत्काल प्रतिशोध की चाहत से नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के अंदरूनी कक्षों में तापमान अचानक बढ़ गया। कर्मठ सत्तानायक जानते हैं कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाया गया, तो ऐसे हादसे हमेशा होते रहेंगे।

उस समय प्रधानमंत्री ढाका के दौरे की तैयारी कर रहे थे। ऐसे में, कमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने संभाली। डोभाल आतंकवाद से लड़ने के अभ्यस्त हैं। 'ऑपरेशन ब्लैक थंडर' के समय वह खुद स्वर्ण मंदिर में मौजूद थे। अशांत मिजोरम को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। कहा तो यह भी जाता है कि उन्होंने दाऊद को दुबई में दबोचने की योजना बनाई थी, जो किसी वजह से सिरे न चढ़ सकी। अब आतंकवादियों की गर्दन मरोड़ने का एक और मौका उनके सामने था।

उन्होंने बिना समय गंवाए मणिपुर के हालात का जायजा लिया। थल और वायु सेना प्रमुखों से संपर्क साधा। खुफिया एजेंसियों के सारे सूत्रों को खंगाला और नौ जून को पौ फटने से पहले जब भारतीय सेना ने म्यांमार में आतंकवादी शिविरों पर धावा बोला, तब शिथिल पड़े हत्यारों को आभास तक न था कि मौत उनके सिर पर आ खड़ी है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस ऑपरेशन में 38 दहशतगर्द मारे गए और उनके कैंप तबाह कर दिए गए। रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि इस ऑपरेशन के दौरान जो जानकारियां हासिल हुईं, वे भविष्य में खूनी नगा गुटों की नाक में नकेल डालने के काम आएंगी।

आप सोच रहे होंगे कि अगर सब कुछ इतना अच्छा है, तो फिर विवाद क्यों?  इस लेख की शुरुआत में मैंने आपसे अनुरोध किया था कि इतिहास के खाते में दर्ज सत्य को तर्कों के मायाजाल से गुजरना होता है। यह सत्य है कि इस ऑपरेशन से एनएससीएन (खाप्लांग) को भारी नुकसान हुआ। यह भी सच है कि इससे खुराफाती पड़ोसियों में संदेश गया कि भारत अब इस तरह की घटनाओं पर चुप नहीं बैठेगा। इसके बरक्स विवाद जिन बातों पर खड़ा किया जा रहा है, वे हैं- इस ऑपरेशन में कितने लोग मारे गए? सरकार को कितना श्रेय मिलना चाहिए? इसमें क्या अनूठापन था? खुफिया सूचनाएं पूरी थीं या अधूरी? इस बहस-मुबाहिसे के पीछे राजनीतिज्ञों के अपने स्वार्थ हैं। जहां सरकार खुद को 56 इंच के सीने वाला साबित करना चाहती है, वहीं विपक्ष इस ऑपरेशन के फायदों पर मिट्टी डालने का प्रयास कर रहा है।

सवाल उठता है कि सही क्या है?  पहले सबसे गंभीर आरोप की छानबीन। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने इस ऑपरेशन से राजनीतिक फायदा उठाने के चक्कर में पड़ोसियों के कान खड़े कर दिए। वे यह भी कहते हैं कि 1995 से अब तक म्यांमार में दो या तीन ऐसे ऑपरेशन हो चुके हैं। तब की सरकारों ने इसे सिर्फ आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित रखा था, कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं तलाशा। यह सच है कि म्यांमार सरकार के सहयोग से पहले भी ऑपरेशन हुए हैं, पर पिछले बीस सालों में दुनिया तेजी से बदली है। 1995 में न खबरिया चैनल थे और न सोशल मीडिया। तब खबरें छिपाई जा सकती थीं अथवा उन्हें तोड़-मरोड़कर छपावाया जा सकता था। अब ऐसा नहीं है। सरकार अगर स्थिति साफ न करती, तो यकीनन आतंकवादी और मुल्क के दुश्मन सोशल मीडिया के जरिए प्रवाद फैला रहे होते। सरकार की घोषणा से एक फायदा यह भी हुआ कि देश के लोगों को समझ में आ गया कि हम कोई लिजलिजे लोकतंत्र नहीं हैं कि जो चाहे, वह हमारे जवानों को मारकर चला जाए।

हो सकता है, राजनीतिक लाभ उठाने के लिए एकाध मंत्री ने उतावलेपन में कूटनीति की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर दिया हो, पर यह कहना कितना जायज है कि इसने पाकिस्तान को प्रतिक्रिया देने पर मजबूर कर दिया? क्या हम इस्लामाबाद के रहमोकरम पर जिंदा हैं? जो देश दाऊद, सैयद सलाउद्दीन और जकीउर्रहमान लखवी जैसे भारत द्रोहियों को पनाह देता हो, हमें उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए?  भय के व्यापारी यह भी फरमाते हैं कि पाकिस्तान परमाणु शक्ति है और हमें उसे उकसाना नहीं चाहिए। मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक याद दिलाना चाहता हूं कि कारगिल में दोनों देशों की फौजें टकराई थीं। तब भी तो उनके पास परमाणु बम थे। उस समय हमें ऐसे लोगों की सलाह मानकर क्या अपनी भूमि उनके हवाले कर देनी चाहिए थी? तत्कालीन सरकार ने घुसपैठ की जानकारी मिलते ही तय किया कि इस हरकत को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इसी सोच से 'ऑपरेशन विजय' उपजा, जिसे सैन्य इतिहास हमेशा आदर से याद करेगा। देश में जहां-तहां बिखरे शंकालुओं से पूछा जाना चाहिए कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली ने हड़बड़ी में भारत के खिलाफ प्रस्ताव क्यों पास कर डाला?  जनरल परवेज मुशर्रफ से यह क्यों कहलवाया गया कि हमने चूडि़यां नहीं पहनीं! म्यांमार अभियान से पाकिस्तान में इतना हड़कंप क्यों? जाहिर है, इस्लामाबाद और रावलपिंडी का खतरनाक गठजोड़ अपने देश में छिपे भारत विरोधी आतंकवादियों को ढाढ़स बंधाने की कोशिश कर रहा था कि घबराओ मत, हम आपके साथ हैं।

यह भी सोचने की बात है कि पाकिस्तान के अलावा किसी पड़ोसी ने कटु प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी? ऐसा अकारण नहीं है। नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद खुद आगे बढ़कर पड़ोसियों से बेहतर संबंध बनाने की पहल की। बांग्लादेश से भूमि समझौता और नेपाल के भूकंप पीडि़तों को राहत कुछ ऐसे अहम पड़ाव हैं, जो दक्षिण एशिया में माहौल को भारत के पक्ष में परिवर्तित कर रहे हैं। यही वजह है कि पाकिस्तानी नीतिकार अब चीन की आड़ लेने की कोशिश कर रहे हैं। यहां यह जान लेने में भी हर्ज नहीं है कि चीन ने जब ताकत संजोई थी, तो उसने सबसे पहले पड़ोसियों पर रुआब गालिब किया था। उसने भारत, वियतनाम और तत्कालीन सोवियत संघ से बाकायदा जंग लड़ी। ताईवान और दक्षिण कोरिया को धमकाया।

थाईलैंड एवं बर्मा जैसे छोटे मुल्कों तक में तरह-तरह से घुसपैठ की। 1972 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी प्रतिनिधि के नाते उसका पहला वीटो था बांग्लादेश के खिलाफ। बीजिंग दुनिया में पैर पसारने से पहले अपने एशियाई पड़ोसियों पर दबदबा कायम करना चाहता था। भारत इसका उल्टा कर रहा है। हम पड़ोसियों से उलझने की बजाय मित्रता कर रहे हैं। ऐसे में, अगर कोई परवान चढ़ती दोस्ती और हमारे अंदरूनी मामलात में दखल देता है, तो उसे अपना दम दिखाने में हर्ज क्या है? 'म्यांमार ऑपरेशन' इसी 'नई नीति' का नतीजा है। इस नीति का कितना लाभ मिलेगा, इसके लिए हमें इंतजार करना होगा। कूटनीति की दुनिया में शह को मात और मात को शह में बदलते भी देखा गया है।
@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com

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