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मैं अब भी बहुत अच्छा गुरु नहीं

अम्मा ने शुरू से ही मेरे दिमाग में ईमानदारी की नींव रख दी थी। अपने बाबा के प्रति, बाबूजी के प्रति हमेशा यही ख्याल आया कि उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा ईमानदारी से सिखाया है, वही मुझे भी करना है। मैंने भी अपने बच्चों को हमेशा ईमानदारी से सिखाया। कितने गुरु बना दिए, जो अभी अच्छा-अच्छा काम कर रहे हैं। हालांकि मैं अब भी खुद को एक अच्छा शागिर्द मानता हूं, गुरु नहीं। क्योंकि मेरा मानना है कि गुरु ने सुबह-सुबह एक नया मंथन मेरे दिल में डाल दिया। अब उस नए मंथन के साथ मेरे दिन की शुरुआत हुई, उसके बाद मैं सिर्फ यही सोचता रहता हूं कि शाम होते ही अपने शिष्यों को वह नई चीज मैं सिखा दूंगा, लेकिन सबसे पहले उस मंथन को सीखने वाला तो मैं ही हूं। भले ही मंथन दिल और दिमाग करता है, लेकिन शिष्य तो मैं ही हूं। इसलिए कुछ भी नया सृजन हो, तो सबसे पहले मैं ही उसे सीखता हूं, फिर उसको सिखाता हूं, मेरे साथ यह निरंतर बना हुआ है। ईश्वर की कृपा से यह प्रक्रिया बंद नहीं हुई है आज भी। पहले कोई चीज बनती है, फिर मैं उसको सीखता हूं और उसके बाद सिखाता हूं। इसलिए मैं आज भी अपने आपको शिष्य मानता हूं, गुरु नहीं।

इस उम्र में भी मुझ पर संगीत की ऐसी धुन सवार है कि मुझे किसी चीज की कमी नहीं लगती। यही हमारी जिंदगी है। अब भी मैं खोज में लगा रहता हूं। नई-नई चीजें निकालने, उन्हें बनाने में लगा रहता हूं। यही मेरा ध्यान है। सच कहूं, तो पिछले छह-सात दशक से स्वर और ताल ही मेरा जीवन हैं। इन दोनों का रिश्ता भी कमाल का है। ताल के बिना स्वर नहीं, स्वर के बिना ताल नहीं। ताल जब शुरू होता है, तो उसी के साथ स्वर दौड़ता है। स्वर के साथ ताल दौड़ता है। चोली-दामन का साथ है। अगर आप काफी देर तक आलाप ही करते रहे, तो लोग ऊबने लगते हैं, लेकिन उसके साथ तब धीरे-धीरे ताल का समावेश होता है, तो लोगों को मजा आने लगता है। उन्हें लगता है कि अब कुछ शुरू हुआ। मैं मानता हूं कि स्वर और ताल पूरी प्रकृति में हैं। हाथी को हिरन की तरह नहीं बनाया। हिरन दौड़कर कुलांचे भरता है, हाथी अपनी चाल से चलता है। कुदरत ने शेर को ज्यादा ताकत दी है, दौड़कर पकड़ने के लिए। हर पक्षी में पर मारने की टाइमिंग है। वह तय समय पे ही पर मारता है। हमें तो हर चीज में लय दिखाई देती है। हर पेड़ की हर डाल में नृत्य दिखता है। हर पत्ता नाचता हुआ दिखता है। पत्तियां जब हिलती हैं, तो थिरकन सुनाई देती है। रात में आप गौर से सुनें, तो हवा के साथ उनकी आवाज में घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है। महादेव शिव ने तो पूरी प्रकृति को नचा दिया। फिर भला आप जाओगे कहां, कहां नृत्य नहीं है? इसीलिए स्वर को हमने देवी माना है और ताल को देवता।

मेरा हमेशा से यही मानना रहा है कि गुरु का आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा, ये दोनों चीजें मिलकर इंसान को बहुत कुछ दे देती हैं। इसका एक वाकया मैं आपको सुनाता हूं। एक बार मुंबई में भजन का एक कार्यक्रम था- प्रगट भए नंदलाल,  बाबा की रचना थी। बाबा ने तो 5,000 रचनाएं लिख डालीं। मंच पर मेरा भाव खत्म हो गया, मैं भगवान को झूलाते हुए चुपचाप खड़ा हो गया। भाव ऐसा था कि भगवान प्रगट हो रहे हैं। मंच पर संगत करने वाले साथी कलाकार चुप हैं, और ऑडियंस खामोश। किसी को पता ही नहीं चला कि कब भाव खत्म हो गया है, अचानक कुछ सेकंड्स के बाद जब तालियां बजीं, तो मैं भी चौंका कि अरे ये तो भाव खत्म हो गया है। संगीतकारों से लेकर मैं खुद, हम सभी खोए हुए थे। उस रोज मंच पर जरूर ऐसा कोई भाव हुआ होगा कि हम सब जरा भी अपने होश में ही नहीं थे। अगर आप ऊपर वाले का सही तरीके से मनन करने वाले कलाकार हैं, तो ऐसी घटनाएं हो जाती हैं।

अब मुझसे लोग अक्सर लखनऊ  घराने की खासियत पूछते हैं। मेरे लिए इस घराने की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि लखनऊ  वाले शरीर के हर हिस्से को अहमियत देते हैं। यानी कि कोहनी कौन है, कंधा कौन है, कलाई कौन है, आंखें कौन हैं, भौंहें कौन हैं? अपने नृत्य में वे हर अंग-उपांग को पूरी तरह से अहमियत देते हैं। ऐसे कई लोग हैं, जो सिर्फ छंद को देखते हैं, हम लोग शरीर के हर हिस्से को देखते हैं। शरीर के संपूर्ण शृंगार को अपने नृत्य-ताल और सुर से भर देते हैं, अन्य जगहों पर यह बहुत कम होता है। मैं मानता हूं कि ईश्वर ने मुझे बड़ी जिम्मेदारी दी है, प्रभु ने मुझे जो बुद्धि दी है अपने काम के लिए, इतनी बड़ी चीज दे दी है कि वह कभी न खत्म होने वाली है, अंतहीन है। जब तक यह जीवन है, तब तक नया सृजन चलता रहेगा।

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