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डालडा डाट साब की लीला

'डाट साब' का मतलब जानते हैं?
यह वह अनोखा प्राणी है, जो सिर्फ हिंदी में मिलता है। एक अध्ययन के अनुसार, अंग्रेजी के 'डाट काम' का चलन तो बहुत बाद में शुरू हुआ, उससे कहीं पहले हिंदी में 'साब' के आगे 'डाट' शब्द का चलन शुरू हो चुका था। कौन जाने कि 'काम' वालों ने 'काम' के आगे जो 'डाट' लगाया, वह हिंदी से चुराया हो। एक रिसर्च कहती है कि 'डाट' शब्द का प्रयोग पहले-पहल हिंदी में हुआ। अंग्रेजी में बहुत बाद में आया। और अब भी जब हर बंदा 'डाट काम' हुआ पड़ा है, तब भी हिंदी में 'डाट साब' चलता है। एक मानी में 'डाट साब' 'डाट काम' का बाप है।

'डाट काम' की महिमा से 'डाट साब' की महिमा सवाई है। यही हिंदी की कमाई है। वह हिंदी वाला ही क्या, जिसके जानने वाले उसे दिन में दो चार बार 'डाट साब' कहकर न पुकारें? 'डाट साब' शब्द के कई आयाम हैं। कई पर्याय हैं। उसके कई प्रकार हैं और कई उच्चारण-भेद हैं। किसी के लिए वह 'डाट्सा' है। किसी के लिए 'डाक्टसा' है, किसी के लिए 'डाक्टर साहिब' है, तो किसी के लिए 'डाकटर साहेब।' डाट के पीछे 'साहब' कब लगा, क्यों लगा, इसका पता नहीं, पर हिंदी में बड़े से बड़ा 'साहब' सिर्फ कालांतर में 'साब' मात्र रह जाता है।

कुछ लोग मानते हैं कि 'डाट' वाली बोतल की 'डाट' जब किसी हिंदी वाले को उछलकर लगी, तो वह आदमी 'डाट साब' कहलाने लगा। कुछ लोगों का मानना है कि जिसे सबसे ज्यादा 'डांट' पड़ती है, वही 'डाट साब' हो जाता है। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि हिंदी के आदमी के नाम के आगे जो 'डा.' लगता है, वह 'डालडा' का प्रथमाक्षर है। जिस तरह एक जमाने में 'डालडा' लोकप्रिय था, उसी तरह हिंदी में 'डा.' भी लोकप्रिय है।

'डाट साब' व्याकरण की दृष्टि से क्या है? यह व्याकरण तक नहीं बता पाता। नहीं बताता है। यह वह अमर 'अव्यय' है, जो बार-बार के उपयोग से व्यर्थ नहीं होता। न अंग्रेज होते, न 'पीएचडी' का धंधा शुरू कराते। न हर आदमी 'डाक्टरेट' के लिए तरसता और न 'डाट साब' कहलाता। अंगे्रजों ने 'पीचडी' चलाई, तो हिंदी वाले तुरंत समझ गए कि भइए! हिंदी में भी पीएचडी करनी-करवानी है। बस फिर क्या था, हर आदमी पीएचडी करने को ललकने लगा और 'डाक्टर' कहलाने लगा। 'डाक्टर' शब्द का उपयोग साबुन की बटिया की तरह होने लगा। हिंदी में आकर बटिया घिसने लगी और 'डाक्टर' की 'डाट' भर रह गई। हिंदी विभागों में कहीं चले जाइए, वहां हर कहीं 'डाट साब' सुनाई देगा।

'डाट साब' संबोधन इस असार संसार में हिंदी विभागों का हिंदी साहित्य के लिए मौलिक सविनय नैवेद्य है। वह हिंदी विभाग क्या, वह हिंदी विभागी क्या, जिसके नाम के आगे अत्यंत सुखकारी 'डा.' न चिपका हो? 'डा.' माने डाक्टर। 'डा.' माने 'डाक्टरेट किया हुआ।' 'डा.' माने 'डाट साब।' जिसने विभागों में डाक्टरेट होते देखा या किया है, वही जानता है कि आदमी से 'डाट साब' बनने की प्रक्रिया क्या है? कितनी सहज-सरल और कितनी उत्तम है? जिस तरह मेडिकल का डॉक्टर अपने मरीज की दवा-दारू करता है, मरहम-पट्टी करता है, उसी तरह हिंदी वाला भी हिंदी की तीमारदारी करता है। यह और बात है कि इस चक्कर में उसकी दो-चार हड्डियां और चटक जाती हैं। आज जो भी टूटी-फूटी हिंदी बची है, ज्यादातर डालडा डाट साबों ने ही बनाई है।
जोर से बोलो: डालडा डाट साब की जै!

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