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सावन में तकधिनाधिन

कोई कह रहा था कि सावन ड्योढ़ी पर सांकल बजाने लगे, तो गर्दभ राशि वालों को हरा-हरा सूझने लगता है। सूखी घास चरती गायों को भी हरा चश्मा लगा दिया जाता है। बाकी गधों को अपनी नाक के आगे झूलती प्लास्टिक की लाल गाजर भली लगती रहती है। हरा और लाल मिलकर किसी पार्टी का झंडा बनें, तो क्या कहने? उत्तम देश में इसी का हल्ला बोल है। ये अब एक सामाजिक मुहावरा है। कहां लैपटॉप जैसी मोदी की सरकार और कहां कांग्रेस का पुराना खटारा टाइप राइटर? सीनियर सिटीजन को कोई रोग न हो, तो उनका बुढ़ापा जस्टीफाई नहीं होता। निरोगी बुड्ढा काफी खतरनाक होता है। सावन की आहट आते ही बचे-खुचे मोर अपने पंख समेटकर पांवों में घुंघरू बांधने लगते हैं। सरकारी आदेश हो, तो नाचना शुरू करें। मोरनी कब तक सिंगार किए बैठी रहेगी? सावन के मारे किसी छायावादी कवि ने कहा था- अहा! टूटी-फूटी सड़कों पर घुटनों घुटनों पानी।

सावन आते ही छाते-छतरियां एक-दूसरे के गले लिपटने लगती हैं। यही तो बालकनियों में बैठकर नैन-फाइटिंग के दिन हैं। गरीबों की छतों से पानी टपकने की बेला आ रही है। शहरी पतिव्रताओं की वार्षिक विरह बेला भी यही है। पतिदेव हैं कि पूरे हफ्ते कैजुअल लीव लेने का मन करता है, फागुन का बचा-खुचा आलस सावन में नसें तोड़ने लगता है। बड़े घरों की बेबियां आसपास पेड़ की डाल ढूंढ़ने लगती हैं कि मिल जाए तो माली से कहकर प्लास्टिक का झूला डलवा दें। कुंठित शायर तो बरामदे की बल्ली पर बैठकर हर साल यही गुनगुनाता है कि- पानी चढ़ा तो दरीचों में भर गया। अबकी बारिशों में मेरा ही घर गया। सावन टाइम से हो न हो, बड़े-बड़े मॉल अपने यहां रेन डांस का इंतजाम रखते हैं। कपड़े उतारने के अतिरिक्त पैसे नहीं लेते। स्वीमिंग पूल में छलांग लगाने से पहले एक पुराना फिल्मी गीत बजाया जाता है कि- बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बरसात में। पूल में खुलेआम तकधिनाधिन करने पर मनाही होती है। उसी के तो पैसे लिए जाते हैं। कभी-कभी असली सावन को बिसूरते मैंने यहीं देखा है।

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