DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

फैसले की घड़ी

कभी-कभी फैसले लेना कितना आसान होता है। आनन-फानन में हम फैसले ले डालते हैं। और कभी फैसला लेने में दिक्कत ही दिक्कत होती है। हम सोचते हैं कि काश! हमें फैसला लेना ही नहीं पड़ता या थोड़ा और वक्त मिल जाता। लेकिन...। 'फैसले लेने का वक्त हम चुन नहीं सकते। हमें हर हाल में अपने को तैयार करके फैसला लेना होता है।' यह मानना है रीता वॉटसन का। वह येल यूनिवर्सिटी के साइकियाट्री विभाग में पॉलिसी ऐंड एजुकेशन की डायरेक्टर रही हैं और फिलहाल फेलो के तौर पर जुड़ी हुई हैं। उनकी मशहूर किताब है, द आर्ट ऑफ डिसीजन मेकिंग: 20 विनिंग स्ट्रैटेजीज फॉर वीमेन। फैसले लेना आसान नहीं होता। हम जब परेशानी में होते हैं, तो फैसले लेना और भी मुश्किल हो जाता है। हमारे परेशानी में होने का यह मतलब तो नहीं कि हम फैसले लेना बंद कर देंगे।

कुछ वक्त के लिए हम अपने फैसलों को टाल सकते हैं। वह भी हर मामले में नहीं। लेकिन जिंदगी अगर जीनी है, तो फैसले लेने ही पड़ते हैं। अक्सर हमें ऐसे वक्त फैसले लेने पड़ते हैं, जब हमारा मन बिल्कुल अच्छा नहीं होता। मन जब अच्छा न हो, तो कुछ भी करना मुश्किल होता है। फैसला लेना तो और भी मुश्किल होता है। असल में हम नहीं, वक्त तय करता है उस फैसले की घड़ी। असल में, उसी वक्त हमारा इम्तिहान होता है। हमारी असल शख्सीयत की पहचान भी तभी होती है। उस परेशानी के समय में हम कैसे फैसले लेते हैं? उससे हमारी जिंदगी तय होती है। हम उससे बच नहीं सकते। परेशानी के उस आलम में हमें अपने को खंगालना होता है। हम उखड़े हुए होते हैं, लेकिन हमें खड़े रहना होता है। तमाम तरह की भावनाएं हमें हिला रही होती हैं। और उन भावनाओं पर हमें काबू पाना होता है। यही सबसे मुश्किल काम होता है, लेकिन उसे करना ही होता है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:फैसले की घड़ी