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इस माटी में कुछ तो है

जो सड़क बिहार को गुजरात से जोड़ देती है, उसी सड़क के करीब है सरिसब पाही। सरिसब पाही गांव का मतलब मेरे लिए अच्छी मिठाई और कमाल के गप्प के शौकीन लोग हैं। इस गांव में ऐसा बहुत कुछ है, जिसे हर गांव को समझना-बूझना होगा। गांव में हाई स्कूल व कॉलेज का होना, गांव में बैंक, अस्पताल और पुस्तकालय का होना और सबसे बड़ी बात, इतना सब होते हुए भी गांव की महक को बनाए रखना, चुनौती से कम नहीं है। कोसी के उस पार मतलब पूर्णिया से इस पार आना मेरे लिए हमेशा से सुखद एहसास देने वाला रहा है। यहां की चिकनी मिट्टी की खुशबू हम जैसे लोग ही समझ सकते हैं, जो बलुआही माटी में पले-बढ़े हैं।

रिटायरमेंट के बाद शहर के लोगों का यहां फिर से बस जाना, मेरे जैसे लोगों के लिए 'मोरल बुस्टिंग टॉनिक' की तरह है। गांव में साहित्य चर्चा के लिए बैठकी करना, इस 'बाजार युग' में अजूबे से कम नहीं। आम के बगीचे से आती महक बताती है कि इस इलाके में कुछ तो ऐसा है कि यह अपनी ओर खींच लेता है। इस गांव के गौरवशाली इतिहास में डूबने के बदले मैं वर्तमान को समझने की कोशिश करता हूं। गांव में शहरी सुविधा के समाजशास्त्रीय पहलू को समझने की जरूरत है। माइग्रेशन केवल गांव से शहर की तरफ नहीं होता, एक खास आयु वर्ग का शहर से गांव की ओर भी होता है। सरिसब पाही और आसपास के कई गांव में हमें यह देखने को मिला। इन बुजुर्ग लोगों की जरूरतों की पूर्ति के लिए गांव का शहर हो जाना अपने आप में खबर है।
गिरीन्द्र नाथ झा की फेसबुक वॉल से

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