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मेरी मौत से उन्हें क्या हासिल होगा

महज 15 साल की उम्र में गिरफ्तार आफताब को 22 साल की कानूनी जद्दोजहद के बाद बुधवार की सुबह लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर लटका दिया गया। आफताब को पांच सितंबर, 1992 को घटी एक घटना के लिए फांसी की सजा सुनाई गई थी। उस पर एक औरत और उसके दो बेटों के कत्ल का आरोप था। आफताब इससे लगातार इनकार करता रहा। जिस एकमात्र 'चश्मदीद' की गवाही पर उन्हें सजा दी गई,  उसने हाल ही में एक मंत्री के सामने यह कबूल किया था कि वह मौका-ए-वारदात पर मौजूद नहीं था। आफताब कहता रहा कि उसे गिरफ्तार करने वाली पुलिस ने उसकी रिहाई के बदले 50 हजार की रिश्वत मांगी थी,  मगर मामूली प्लंबर यह मांग पूरी नहीं कर सका।... फांसी की तारीख मुकर्रर होने के बाद उसने यह मर्मस्पर्शी खत लिखा था-

मुझे अभी-अभी ब्लैक वारंट (फांसी की तारीख तय होने की सूचना) सौंपा गया है। इसमें लिखा गया है कि 10 जून, बुधवार को गले में फंदा डालकर मुझे तब तक लटकाया जाएगा, जब तक कि मैं मर न जाऊं। मैं बेगुनाह हूं, मगर मैं नहीं जानता कि इससे कोई फर्क पड़ेगा। बीते 22 साल की कैद के दौरान, मुझे कई दफा मौत के वारंट मिले हैं। यह अजीब ही है, मगर मैं आपको तब भी यह नहीं बता सकता कि कितनी बार मुझे यह बताया गया कि बस मैं मरने ही वाला हूं। जब भी वारंट जारी किए जाते हैं, बुरा लगता है। मैंने अपने आखिरी दिन गिनने शुरू कर दिए हैं, जो अपने आप में दर्दनाक है और इन दिनों मैं यह भी महसूस कर रहा हूं कि मेरी नब्ज उसी तरह बेडि़यों में बंधी है, जैसे मेरा बदन जंजीरों में जकड़ा हुआ है। असल में, मैं अपनी मौत से पहले ही कई दफा मर चुका हूं। मुझे लगता है कि मेरी जिंदगी के अनुभव ज्यादातर लोगों से अलग होंगे। लेकिन इसे लेकर मेरे मन में संदेह है कि क्या इससे भी कुछ ज्यादा खौफनाक हो सकता है कि आपको बताया जाए कि आप मरने ही वाले हैं, और एक कैदखाने में आप बैठे-बैठे उस पल का बस इंतजार कर रहे हों। कई वर्षों से, मैं जिंदगी और मौत के बीच कहीं अटका हुआ हूं। महज 15 साल की उम्र में ही मुझे सलाखों के पीछे भेज दिया गया था। तब से आज तक मैं अनिश्चितताओं के घेरे में कैद रहा, अपने भविष्य को लेकर यह घनघोर अनिश्चितता है।

मैं एक ईसाई हूं, और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक होना कई बार काफी मुश्किल भरा होता है। बदकिस्मती से, एक कैदी ने हमारी जिंदगी को और मुश्किल बना दिया। मैं नहीं जानता कि उसने ऐसा क्यों किया? ईसाइयों पर हुए बम विस्फोटों से मैं काफी परेशान रहा। ये फिदायीन हमले पेशावर में हुए थे। इस घटना ने मेरे दिलो-दिमाग को भीतर तक लहूलुहान कर दिया। मेरी आरजू है कि काश! पाकिस्तानी लोग अपने अंदर राष्ट्रीयता का सच्चा भाव पैदा कर पाते, जो उनके अंदर की सांप्रदायिकता को खत्म करता। यहां कैदखाने में हमारा एक छोटा-सा समूह है, जिसमें महज चार या पांच ईसाई हैं और अब हम सब एक ही काल कोठरी में हैं। इससे मेरी जिंदगी कुछ बेहतर हुई। अपने गम को भुलाने के लिए जो भी मुझसे हो सकता है, मैं वह हर चीज करता हूं। मैं एक कला प्रेमी इंसान हूं। दरअसल, मैं एक फनकार था, साधारण ही था। लेकिन यह कला मेरे अंदर शायद तब से है, जब मैंने किसी चीज को महसूस किया।

इससे पहले चित्रकारी और साथ ही साथ कविता लिखने की तरफ मेरी दिलचस्पी बढ़ी। हालांकि, इनके लिए मुझे कोई तालीम हासिल नहीं हुई थी, बल्कि ये चीजें ऊपरवाले की नेमत थीं। लेकिन जब मुझे जेल में लाया गया, तब से अपने जज्बात बयान करने के मुझे कोई और जरिया नहीं मिला, क्योंकि उस वक्त मैं अपनी जिंदगी से ऊब गया था और तन्हाई की गिरफ्त में था। कुछ वक्त पहले, मैंने कोट लखपत जेल के तमाम चिह्न बनाने शुरू किए। यहीं पर मुझे कैद करके रखा गया है। इसके बाद मुझसे कहा गया कि दूसरी जेलों के लिए भी निशान और नाम-पट्टे बनाओ। दुनिया की कोई भी चीज मुझे इतनी खुशी नहीं दे सकती, जितनी मुझे अपने ख्यालों को रंग भरने से या कैनवस पर कूची चलाने से मिलती है। यही मेरी जिंदगी है, इसलिए यह करके मुझे बेइंतिहा खुशी भी हासिल होती है। मेरे ऊपर काम का बड़ा बोझ है, इसलिए हर दिन शाम ढलते-ढलते मैं थक जाता हूं। लेकिन यह करके मैं खुश हूं, क्योंकि दूसरी चीजों से यह मेरा ध्यान हटाए रखता है।

अपना कोई परिवार है नहीं कि कोई मुझसे जेल में मिलने आए। इसलिए जब भी कोई आता है, तो मेरे लिए यह बहुत अच्छा अनुभव होता है। इससे मुझे बाहर की दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उनको जानने का मौका मिलता है और फिर मैं उन सबको अपने कैनवस पर उकेरा करता हूं। पुलिस ने मुझ पर कैसे-कितने जुल्म ढाए हैं, जब इससे जुड़ा कोई सवाल उछलता है, तो मैं उन खौफनाक यादों में लौट जाता हूं, जिनको मैंने तस्वीरों में ढाला है। बेहतर होगा कि मैं इन सबके बारे में अब न सोचूं कि झूठे अपराध कबूलवाने के लिए पुलिस ने क्या-क्या कोशिशें कीं। दिसंबर, 2014 में जब हमने यह खबर सुनी कि फांसी की सजा पर लगी रोक को अब हटा लिया गया है, तब यहां जेल के अंदर खौफ का माहौल पसर गया था।

सबके चेहरे पर दहशत चस्पां हो गई थी। ऐसा लगता था कि इस माहौल में हम सबके भीतर उदासी और मनहूसियत उतर आई हो। लेकिन इसके बाद कोट लखपत जेल में फांसी की सजा की तामील शुरू हुई और हर किसी को मानसिक यातना से गुजरना पड़ा था। जिन्हें तख्ते पर लटकाया गया, वे मौत की इस राह पर वर्षों तक हमारे साथ उम्मीद-नाउम्मीदी को जीते रहे थे और यह स्वाभाविक ही था कि उनकी मौत हमारे लिए निराशा और मनहूसियत छोड़ गई।

हालांकि, दहशतगर्दों को मारने के नाम पर मौत की सजा पर लगी रोक को हटाया गया था, लेकिन कोट लखपत जेल में इनमें से ज्यादातर कैदी तो आम अपराध के दोषी ठहराए गए थे। वैसे भी उन्हें मार देने भर से इस मुल्क से सांप्रदायिक हिंसा कैसे खत्म हो जाएगी, मैं नहीं बता सकता। यही उम्मीद है कि बुधवार को मैं न मरूं। लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं। इसलिए मैं सिर्फ ऊपर वाले पर भरोसा कर सकता हूं और अपने वॉलंटियर वकीलों पर। मैंने अभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है, यह जानते हुए भी कि रात बहुत गहरी है।
साभार: द गार्जियन

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