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हुनरमंद श्रमिक ही हैं रोबोट का जवाब

कुछ समय पहले तक कहानियों और फिल्मों में तरह-तरह के यंत्रीकृत मानवों यानी रोबोट के जो दृश्य उभरा करते थे, वे अब साकार होते दिखाई दे रहे हैं। 'इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स' की हाल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 से 2017 के दौरान दुनिया भर में रोबोटों की तैनाती में सालाना औसतन 12 फीसदी की दर से वृद्धि होगी। जहां अमेरिका व यूरोप में यह वृद्धि दर छह फीसदी होगी, वहीं एशिया और ऑस्ट्रेलिया में 16 फीसदी होगी। एशियाई बाजारों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन और जापान की होगी। वर्ष 2014 के अंत तक चीन में रोबोटों की कुल संख्या 1,80,000 थी, जबकि भारत में 2014 के अंत तक करीब 12,000 रोबोटों का भंडार था। पिछले 10 वर्षों में रोबोट की लागत में तेजी से कमी आई है, जिससे इसकी उत्पादकता में तेज वृद्धि हुई है। नए उद्योगों में यदि किसी उद्योग ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है, तो वह रोबोटिक्स ही है।

रोबोट के कारण 21वीं सदी में वैश्वीकरण और यंत्रीकरण के विस्तार के साथ मानवीय बल और बुद्धि की शताब्दियों से चली आ रही श्रेष्ठता के खत्म हो जाने का खतरा मंडराने लगा है। जापान की सॉफ्ट बैंक कॉर्प कंपनी जैसी दुनिया की कई कंपनियां मानवीय मस्तिष्क की तरह काम करने वाले रोबोट विकसित कर रही हैं। ये रोबोट कई तरह के दिमागी कार्य कर करेंगे। निस्संदेह, दुनिया की अर्थव्यवस्था में रोबोट की अहमियत बढ़ती जा रही है। स्थिति यह है कि श्रमिकों से भरपूर चीन के उद्योगों में तेजी से रोबोट शक्ति का इस्तेमाल होने लगा है। इसका बड़ा कारण यह है कि चीन के विनिर्माण क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में वेतन तेजी से बढ़ा है। परिणामस्वरूप, चीन के कई उद्योगों ने श्रमिक उत्पादकता और लागत के विश्लेषण के बाद रोबोट की उत्पादकता और गुणवत्ता को स्वीकार किया है। हमारे देश में वाहन उद्योग में रोबोटों की संख्या सबसे अधिक है। देश में स्थित प्रमुख कार कंपनी हुंडई के श्रीपेरंबुदूर कारखाने में 400 से ज्यादा, तो फोर्ड की साणंद इकाई में 437 रोबोट तैनात हैं। मारुति-सुजूकी के गुड़गांव और मानेसर में 1,000 से ज्यादा रोबोट काम कर रहे हैं। जिस तेजी से रोबोट बढ़ रहे हैं, यही रुझान जारी रहा, तो इससे भारत में रोजगार पर असर पड़ सकता है।

रोबोटिक्स की बढ़ती हुई शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं के बीच हमें देश की विकास नीति में इसकी भूमिका पर ध्यान देना ही होगा। ऐसे में, कुछ मुद्दों पर गंभीर विचार जरूरी है। एक, चूंकि देश के विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्द्धा वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र से है, ऐसे में देश के विनिर्माता रोबोट से दूरी बनाकर नहीं रह सकते। लेकिन ऐसे कई उद्योग हैं, जिनमें रोबोट प्रवेश नहीं कर सके हैं, हमें वहां लाभ उठाने के लिए बड़ी संख्या में श्रमिकों को तेजी से कौशल प्रदान करना होगा। 'स्किल गैप' को कम करने के लिए जोरदार कोशिशें करनी पड़ेंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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