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काके दे ढाबे पर खाना और बुखारा का गाना

एक सर्वे के मुताबिक, महिलाएं 24 घंटे में 30 बार झूठ बोलती हैं। ऊपर से आंकड़ा ज्यादा लग सकता है। मगर जब गणना करते हैं कि औसतन एक इंसान एक मिनट में पांच वाक्य बोलता है। एक घंटे में 300, और 18 घंटे जगा, तो दिन भर में तकरीबन 5,500 लाइनें बोलेगा। अब इसमें अगर 30 झूठ बोले, तो यह एक फीसदी भी नहीं हुआ। अगर यह सोचें कि औरतें सिर्फ उम्र को लेकर झूठ बोलती हैं, तो यह यकीन करना मुश्किल है कि कोई उनसे दिन में 30 बार उम्र पूछता होगा। फिर सवाल यह है कि बाकी झूठ किसके लिए? इस बारे में मैंने महिला मामलों के जानकर एक वरिष्ठ से बात की, तो उनका कहना था कि उम्र छोड़ो, उम्र को लेकर तो महिलाएं उम्र भर झूठ बोलती हैं, इसके अलावा भी और कई सारे कारण होते हैं। जैसे उनके कपड़े। भले ही उन्होंने कोई टॉप या कुरता लोकल पटरी वाले मार्केट से 150 रुपये का क्यों न खरीदा हो, मगर ऑफिस में साथियों के पूछने पर यही कहेंगी कि ये फैब इंडिया का है।

खाना भले काके के ढाबे पर खाकर आई हों,  मगर फेसबुक पर यही अपडेट करेंगी कि 'हैविंग ए वंडरफुल डिनर विद माई फैमिली ऐट बुखारा।' हकीकत यह है कि बुखारा जाना तो दूर, अगर उसकी रेट लिस्ट भी पढ़ लें, तो बुखार आ जाए। वहां की दाल का रेट पढ़ते ही पहला ख्याल उनके मन में यही आएगा कि इतने में तो मैं जनपथ से घर पहनने वाले दस पजामे ले आऊंगी। इसी तरह, आजकल छुट्टियों को लेकर झूठ बोलने का भी बड़ा फैशन है। छुट्टी में जाएंगी अपनी मेरठ वाली बुआ के घर, मगर सहेलियों में दावे स्विस आल्प्स देख आने के करेंगी। फिर भले स्विस आल्प्स की स्पैलिंग याद करने में ही उनकी सारी छुट्टियां क्यों न खत्म हो जाएं। मैंने कहा- सर, ये झूठ की बात हो गई, तो क्या महिलाएं कभी सच बोलती ही नहीं? वह बोले- मैंने ऐसा कब कहा? बोलती हैं न। जब कभी उनकी सहेली उनसे पूछती है, सच-सच बताओ न, मैं कैसी लग रही हूं? तब ये कभी दिल रखने के लिए झूठ नहीं बोलतीं।

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