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व्यर्थ का विवाद

भारत ने म्यांमार सीमा में अलगाववादियों के खिलाफ जो कार्रवाई की, वह भारतीय सेना की शानदार सफलता थी, लेकिन उसके बाद काफी विवाद खड़ा हो गया है। एक विवाद तो पाकिस्तान की तीव्र प्रतिक्रिया की वजह से हुआ, जो कि सूचना-प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर के बयान पर आई। राठौर ने इस घटना के बाद कहा था कि भारत आतंकियों के खिलाफ कहीं भी कार्रवाई करेगा और पाकिस्तान जैसे देशों को सचेत हो जाना चाहिए। इस पर पाकिस्तान ने कहा है कि वह म्यांमार नहीं है और उसकी सेना अपनी सीमाओं की रक्षा कर सकती है। दूसरी ओर, म्यांमार ने भी इससे इनकार किया है कि भारतीय सेना ने उसकी सीमा में घुसकर अलगाववादियों के खिलाफ कार्रवाई की है। ये दोनों प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक ही हैं।

म्यांमार के सहयोग से भारतीय सेना ने जिस तरह की कार्रवाई की, वैसी कार्रवाई गुप्त रखी जाती है। कोई भी देश यह प्रचारित नहीं होने देना चाहता कि उसकी सीमा में आकर किसी दूसरे देश की सेना को कोई कार्रवाई करने की इजाजत दी गई है। इसीलिए भारतीय सेना ने जो बयान जारी किया था, उसमें यह नहीं कहा गया था कि कार्रवाई म्यांमार सीमा के अंदर की गई। सेना का बयान बहुत संक्षिप्त था, जिसमें कहा गया था कि म्यांमार-भारत सीमा के साथ लगे इलाके में कार्रवाई की गई थी। ऐसी कार्रवाई आम नहीं है, पर ऐसा भी नहीं कि पहली बार भारतीय सेना ने ऐसा किया हो। ऐसी कार्रवाइयों में काफी खतरा होता है, क्योंकि सेना की बहुत छोटी टुकडि़यों को पराई जमीन पर जाकर कार्रवाई करनी होती है और जरा-सी चूक भयानक साबित हो सकती है।

ऐसी कार्रवाई करने का फैसला इसीलिए सर्वोच्च स्तर पर किया जाता है और उसकी जमीनी तैयारी राजनयिक व सैनिक स्तर पर काफी सुनियोजित की जाती है। राजनयिक स्तर पर अन्य देश की सरकार को इस कार्रवाई के लिए मनाना होता है व सैनिक स्तर पर पूरे अभियान की बारीकी से योजना बनानी पड़ती है। इस कार्रवाई की सफलता का श्रेय निश्चय ही राजनीतिक, राजनयिक व सैनिक नेतृत्व को जाता है। विवाद शुरू हुआ, क्योंकि इस कार्रवाई की सफलता का प्रचार किया गया। पहले कभी ऐसी कार्रवाइयों का प्रचार नहीं किया गया था। राज्यवर्द्धन राठौर ने जिस तरह के बयान दिए और ब्योरों की विस्तार में जानकारी दी, उससे मामला बिगड़ा। सरकार को समझ में आया कि मामला बिगड़ रहा है, तो उसने इसे शांत करने की कोशिश की।

म्यांमार सरकार को इन अलगाववादियों से कोई सहानुभूति नहीं है, पर उसे अपने देश में शांति बनाए रखने की फिक्र है। इसी सिलसिले में उसने कई उग्रवादी गुटों से युद्ध विराम समझौता लागू कर रखा है और उनसे बातचीत की प्रक्रिया जारी है। सार्वभौमिकता के सवाल के अलावा, इस वजह से भी म्यांमार सरकार नहीं चाहती थी कि यह सार्वजनिक हो। पाकिस्तान में ऐसी कार्रवाई करना इसलिए नामुमकिन है, क्योंकि वहां की सरकार के साथ हमारे वैसे संबंध नहीं हैं, जैसे म्यांमार से हैं। सरकारी, गैर-सरकारी हलकों में काफी चर्चा होती आई है कि क्या पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी शिविरों पर सैनिक कार्रवाई की जा सकती है, पर हर वक्त यही निष्कर्ष निकलता है कि ऐसी कार्रवाई का खास फायदा नहीं होगा और इससे बाकायदा युद्ध छिड़ने का खतरा होगा। सरकार बहुत सारे ऐसे काम करती है, जिनका प्रचार न करने में ही भलाई है। 2006 में भी म्यांमार की सीमा में घुसकर कार्रवाई की गई थी, लेकिन इसका बिल्कुल शोर नहीं हुआ। पाकिस्तान से हमारे रिश्ते वैसे ही काफी ज्वलनशील हैं, इसलिए इन्हें सोच-समझकर ही छेड़ना चाहिए।

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