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म्यांमार से सबक ले पाकिस्तान

चीन इस बार रणनीतिक रूप से ऐसे चक्रव्यूह में फंसा है, जिसकी वजह से वह यह नहीं कह सकता कि म्यांमार में भारतीय सेना का ऑपरेशन उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है। चीन को इस समय यह सफाई देनी पड़ रही है कि उसकी सेना का कोई भी जनरल या उसकी खुफिया के लोग नगा अतिवादियों (एनएससीएन-खापलांग) से फोन पर बात नहीं कर रहे थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक अखबार ग्लोबल टाइम्स में सरकारी थिंक टैंक माने जाने वाले लोगों की जो टिप्पणियां छपी हैं, उनका एक ही सुर है-‘पूरी तरह असंभव।’ ‘चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लोग एनएससीएन-खापलांग अतिवादियों से बात करें, वह भी ऐसे समय में, जब भारत से हमारे रिश्ते अच्छे हो रहे हैं, यह मानने वाली बात नहीं है’, ऐसी त्वरित टिप्पणी ‘सीआईसीआईआर’ के उप-निदेशक ली-ली ने दी है। ‘शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज’ के एशिया-पैसेफिक प्रभाग के प्रमुख झाओ कंटेंग ने नई दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी के दो अखबारों में चीनी सेना के किसी वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से छपी खबरों को ‘गलत’ और ‘बकवास’ कहा, जिनमें नगा अतिवादी से हालचाल पूछने के बाद उसे चीनी भाषा सीखने जैसे संदेश को ‘इंटरसेप्ट’ किया गया था। झाओ कंटेंग ने कहा,‘1988 से भारत-चीन के बीच दोबारा से कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए हैं। चीनी अधिकारी पूर्वोत्तर भारत के अतिवादियों को समर्थन देते रहे हैं, यह अफवाह भारतीय मीडिया लंबे समय से चलाता रहा है।’ नकारने वाली टिप्पणियों से लग रहा है, जैसे चीनी सेना और उसकी सैन्य खुफिया के लोग संत हों। चीन के विदेश मंत्रालय ने बुधवार दोपहर तक आधिकारिक रूप से कोई बयान नहीं जारी किया था। यह चीन का अपना तरीका है। वहां पहली प्रतिक्रिया थिंक टैंक की ओर से देने की परंपरा है।

चीनी थिंक टैंक के लोग चाहे जितनी सफाई पेश करें, पर इस सवाल का उत्तर उनके पास नहीं है कि पूर्वोत्तर के अतिवादी गुटों के पास चीनी हथियार आते कहां से हैं? अखबारबाजी नहीं, जो ‘ऑन द रिकार्ड’ है, उसी की बात करते हैं। नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने 26 मार्च, 2011 को एंथनी शिमरे के विरुद्ध, जो कि नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड ‘इशाक-मुइबा गुट’ यानी एनएससीएन-आईएम का मुख्य हथियार प्रबंधक था,  चार्जशीट बनाई थी कि उसने चीन की सरकारी हथियार निर्माण कंपनी ‘नोरिन्को’ के प्रतिनिधि से बैंकॉक में संपर्क किया था। नोरिन्को को उसने पांच लाख डॉलर के पेमेंट किए थे, और बांग्लादेश के कोक्स बाजार के रास्ते 1,800 चीनी हथियार पूर्वोत्तर भारत में लाए गए थे। एक तथ्य यह भी है कि बोडो के बड़े नेता बीजिंग स्थित ‘नोरिन्को’ के कारखाने को देखने गए थे। चीन किस आधार पर इसे नकार सकता है? ‘एनआईए’ को 2007 में एक लाख डॉलर की एक अन्य इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट की रसीद हासिल हुई, जो चीनी हथियार कंपनी ‘टीसीएल’ को थाई आर्म्स डीलर ‘विल्ली’ के माध्यम से दिया गया था। ‘एनएससीएन-आईएम’ को इसके बदले एके सीरीज की असाल्ट राइफलें, लाइट मशीनगन, रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड जैसे एक हजार हथियार भेजे गए थे। नगा अतिवादी गुट का ‘आम्र्स प्रोक्यूरर’ एंथनी शिमरे को 2013 में थाईलैंड के एक क्रिमिनल कोर्ट ने भारत को प्रत्यर्पित किए जाने का आदेश दिया था। मामला वहां की ऊपरी अदालत में जाने के कारण अब इस बात का इंतजार है कि कब उसे थाईलैंड से भारत प्रत्यर्पित किया जाता है। ये सारे तथ्य थाईलैंड के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं। यह कोई अफसाना नहीं है, इसकी जांच में बाकायदा थाईलैंड की खुफिया पुलिस, वहां के गृह और विदेश मंत्रालय के अधिकारी शामिल रहे हैं।

पूरे म्यांमार, थाईलैंड, बांग्लादेश में जो हथियार बेचने वाले गिरोह हैं, उनके ‘नेक्सस’ को तोड़ने के लिए भारत सरकार क्या करेगी? यह सबसे बड़ा सवाल है। इसके लिए इन तीनों देशों की सरकारों की मदद चाहिए। चीनी अवैध हथियार का सबसे बड़ा बाजार पूर्वोत्तर भारत है। चीन को यह समझाना होगा कि उसके जो लोग इस धंधे में हैं, उनके बुरे दिन आने वाले हैं। इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की आवश्यकता है। इस पर रोक नहीं लगी, तो मोदी जी का ‘एक्ट ईस्ट’ कार्यक्रम कागजों पर सीमित होकर रह जाएगा। अब तक 3,200 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार-थाईलैंड सड़क परियोजना, कलादान मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट, इंफाल-मंडाले बस सेवा जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू नहीं हुईं, उसकी बड़ी वजह इस इलाके में जड़ जमा चुके दहशतगर्द हैं। उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए इस्पात-सी इच्छाशक्ति चाहिए।

पूर्वोत्तर में अतिवाद से विकास अवरुद्ध हुआ है, तो उसका सबसे अधिक लाभ चीन को हासिल होता रहा है। हालांकि, अतिवाद को प्रश्रय देने वाला चीन, खुद म्यांमार सीमा पर चैन से नहीं है। म्यांमार सीमा पार जो ऑपरेशन भारतीय सेना ने चलाया, लगभग वैसी ही तैयारी चीन ने  सीमा पार कर रखी थी। चीन के सीमावर्ती इलाके में कोकांग विद्रोही उनके लिए सबसे बड़े सिरदर्द हैं। कोकांग के विरुद्ध कार्रवाई में म्यांमार जुंटा की जेट से सीमा पार चीनी सिविलियन इलाके में बम बरसाये गए, तो चीन भड़क गया। म्यांमार वाले साइड से बम गिराने का सिलसिला मार्च 2015 से ही शुरू है, उसमें कई चीनी नागरिक मारे गए हैं। कोकांग विद्रोहियों को सबक सिखाने और उनमें भय पैदा करने के वास्ते इसी तीन जून को म्यांमार-चीन सीमा पर जमीन से आकाश तक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पांच साझा अभ्यास किए हैं। मगर इससे चीन के विरुद्ध अतिवाद पर विराम लग जाएगा, इसकी गारंटी म्यांमार के सैनिक शासक भी नहीं दे रहे हैं।

थोड़ी देर के लिए हम भी अपना सीना छप्पन इंच का कर सकते हैं कि सीमा पार जाकर हमारे सैनिकों ने आतंकवादियों को ढेर किया है। यों, यह संदेश पाकिस्तान को जा रहा है कि मोदी सरकार ‘सॉफ्ट सरकार’ नहीं है। ऐसा संदेश जाना भी चाहिए। लेकिन पाकिस्तान और म्यांमार की भू-राजनीतिक और सामरिक परिस्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। म्यांमार की सरकार प्रशंसा की पात्र है कि उसने आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई में कदमताल किया। ऐसा सहयोग पाकिस्तान और चीन ने भारत के साथ अब तक नहीं किया है। इसके लिए बड़ा जिगरा चाहिए, जो भूटान और म्यांमार ने समय-समय पर दिखाया है।

भारतीय सेना ने 1971 में सीमा पार पूर्वी पाकिस्तान में सबसे बड़ी कार्रवाई की थी। लेकिन उसे हम नरसंहार करने वाली आततायी सरकार के विरुद्ध युद्ध कह सकते हैं। आतंकवादियों के खिलाफ भारतीय सेना की असल कार्रवाई दिसंबर 2003 में दक्षिणी भूटान में हुई थी, जिसमें अल्फा के 13, एनडीएफबी के 12, और केएलओ के पांच कैंप नेस्तनाबूद किए गए थे। म्यांमार में अप्रैल-मई 1995 और जनवरी 2006 में भारतीय सेना ने अतिवादियों के विरुद्ध ऐसी ही कार्रवाई की थी। तब भी क्या पूर्वोत्तर से आतंकवाद समाप्त हो गया?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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