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नए मीडिया की चुनौतियां

पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में नागरिक बिरादरी के लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, ब्लॉगरों व आंदोलनकारियों पर हमले और हत्याओं की खबरें आती रही हैं। भारत भी इस मामले में अब अपने पड़ोसी देशों की गिनती में आ गया है, जहां मानवाधिकारों और सामाजिक जागरूकता के लिए प्रतिबद्ध व्यक्तियों या संगठनों के प्रति नफरत, हिंसा और असहिष्णुता का बोलबाला है। यह उस अंधेरे के बारे में बताता है, जो लोकतंत्र व नागरिक अधिकारों की जय-जय के चमकते परदे के पीछे अथाह रूप से फैला हुआ है। यूपी के एक पत्रकार को कथित रूप से जलाकर मार डालने की खबर सत्ता राजनीति और समाज के दबंग होते हिस्सों के मजबूत हो चुके गठजोड़ का पर्दाफाश करती है। परंपरागत मीडिया से पृथक नए मीडिया में एक जागरूक, बेचैन और साहसी तबका जरूर पैदा हुआ है, जो नाइंसाफियों पर बेबाकी से बोलता है, लेकिन उसके सुगठित व सुचिंतित आकार की फिलहाल कमी दिखती है। प्रतिरोध में अराजकता अन्याय करने वालों के लिए ही फायदेमंद हो जाती है, लिहाजा प्रतिरोध का अनुशासन बहुत जरूरी है। विचारों की समानता बेशक न हो, लेकिन इंसाफपसंदगी का विचार एक रहे। सोशल मीडिया में सच्चे लेखन, सही ब्लॉगिंग और न्यायसंगत पत्रकारिता की एकजुटता बनी रहे। फिर वह चाहे अघोषित और अदृश्य ही क्यों न हो। नए मीडिया को हालात की सूरत बदलने की ओर बढ़ना चाहिए। जाहिर है, इस काम में खतरे हैं, पर खतरे कहां नहीं हैं?
डायचे वेले में शिवप्रसाद जोशी

 

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