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राज-काज और पीएमओ का विकास

पिछले कुछ समय में एक बड़ी सहमति यह बनी है कि एक साल पहले के मुकाबले देश की अर्थव्यवस्था सुधरी है। इसके अलावा, शासन की मोदी शैली पर ध्यान अधिक केंद्रित हुआ है। मोदी-केंद्रित शैली प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज से जुड़ी है। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री कार्यालय इतना सक्रिय व निर्णायक कभी नहीं रहा, जितना पिछले एक साल में रहा है। इस तरह की भी धारणा पैदा हुई है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) अधिक सतर्क हो गया है, वह मंत्रालयों की भूमिका में कतर-ब्योंत करता है और मंत्रियों के अधिकारों को भी कम कर रहा है। पीएमओ अधिक सत्ता केंद्रित है।

इस मसले को समझने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के विकास पर गौर किया जाना चाहिए और यह भी कि कैसे यह पहले से अलग है। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि पीएमओ से क्या उम्मीद रहती है? केंद्र सरकार में हर मंत्रालय के कामकाज केंद्रीय सचिवालय द्वारा जारी 'ट्रांजेक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स, 1961' से निर्धारित होते हैं। इसके तहत पीएमओ से पहली उम्मीद यह होती है कि प्रधानमंत्री के सामने जो मुद्दे आएं, उनसे वह नियमानुसार निपटे। दूसरी, सरकार के मुखिया के नाते प्रधानमंत्री के ऊपर जो सारी जिम्मेदारियां हैं, उनमें वह मदद करे। इसमें केंद्रीय मंत्रियों से लेकर राज्य सरकारों से संपर्क साधना भी शामिल है, जिनमें प्रधानमंत्री रुचि दिखाते हैं। तीसरी, नीति आयोग के अध्यक्ष के तौर पर प्रधानमंत्री की जो जिम्मेदारियां हैं, उनको पूरा करने में मदद करना। चौथी, प्रधानमंत्री के दफ्तर की तरफ से जन-संपर्क को देखना, यानी प्रेस व जनता से संबंध बनाना। पांचवीं, तय कानूनों के तहत प्रधानमंत्री के सामने पेश मामलों को परखने में उनका सहयोग करना।

इस तरह से, ये कामकाज कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के कार्यालय से अलग नहीं हैं। वर्षों से, पीएमओ अलग-अलग नियुक्तियों और तत्परता के साथ इन कामों को देर-सबेर करता आया है। आजादी के बाद पंडित नेहरू के समय में प्रधानमंत्री को संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी सहयोग करते थे। विदेश महकमे व राष्ट्रमंडल महकमे के प्रधान सचिव विदेश मामलों पर प्रधानमंत्री का मुख्य सलाहकार होते थे और घरेलू मामलों पर कैबिनेट सचिव। कैबिनेट में सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और चिंतामन डी देशमुख जैसे वरिष्ठ मंत्री थे। किसी भी कामकाज में अपनी शक्तियों के कमजोर पड़ने की बात उन्होंने कभी स्वीकार नहीं की।

प्रधानमंत्री का सचिवालय फैसले लेने के मामले में निकास-द्वार का काम करता था, जिसमें मंत्रालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। जब लाल बहादुर शास्त्री ने नेहरू की जगह ली, तो प्रधानमंत्री के निजी दफ्तर को प्रधानमंत्री सचिवालय का नाम देने के अलावा, उन्होंने एक सचिव नियुक्त करके इसके नेतृत्व को मजबूत किया। इस पद पर सबसे पहले बिहार कैडर से एक अधिकारी लक्ष्मीकांत झा आए। वह मेरे पिता के बैचमेट थे। प्रधानमंत्री के सचिव के तौर पर उनकी नियुक्ति पर मेरे पिता ने बताया था कि कैसे उनकी पदोन्नति ने कैबिनेट सचिव के कामकाज को प्रभावित किया। पारंपरिक रूप से कैबिनेट सचिव प्रधानमंत्री का अंतिम सलाहकार होता था और अब यह काम प्रधानमंत्री के सचिव का था।

जब इंदिरा गांधी, शास्त्री की उत्तराधिकारी बनीं, तो कुछ समय तक एलके झा और बाद में उनकी जगह पीएन हक्सर आए, जो पहले सचिव और बाद में प्रधान सचिव बने। यह एक बड़े बदलाव का संकेत था। दरअसल, राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए उन्हें प्रशासनिक ढांचे पर अपने नियंत्रण को मजबूत करने की जरूरत पड़ी थी। वाम पार्टियों के सहयोग को भी उन्हें बचाए रखना था। इस तरह से प्रधानमंत्री सचिवालय आर्थिक, घरेलू व विदेश नीति मामलों के बीच तालमेल बनाने और उसके विकास का एक शक्तिशाली केंद्र बन गया।

आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई ने, जो नए प्रधानमंत्री बने थे, प्रधानमंत्री सचिवालय का नाम बदलकर प्रधानमंत्री कार्यालय कर दिया, क्योंकि इसके अधिक सत्ता-केंद्रित होने की खूब आलोचना हो रही थी। यह सिर्फ नाम बदलना नहीं था, बल्कि इसके अधिकार और किरदार को घटाना भी था। इसके बाद तो पीएमओ आने वाले प्रधानमंत्रियों की शख्सियतों, वरीयताओं और धारणाओं के आधार पर खुद को बदलता रहा। राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री का दफ्तर मंत्रालयों के साथ नीतिगत ढांचा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

राजीव गांधी ने पीसी एलेक्जेंडर के नेतृत्व में एक कुशल टीम बना रखी थी, जिसमें बड़े-बड़े विशेषज्ञ और नौकरशाह थे। मोंटेक सिंह अहलूवालिया और मणिशंकर अय्यर उनमें ही थे। पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल के दौरान अमरनाथ वर्मा के नेतृत्व में पीएमओ 1991 के मुद्रा संकट से निपटने का केंद्रबिंदु बना था। आईएमएफ और विश्व बैंक की शर्तों के साथ प्रभावी तालमेल बनाना इतना आसान नहीं था, लेकिन यह हुआ। वाजपेयी के दौर में पीएमओ ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई।

विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और आंतरिक मोर्चे पर यह दफ्तर काफी सक्रिय रहा। उस दौरान अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के सचिव के तौर पर काम करने का मुझे भी सौभाग्य मिला। पाकिस्तान के मामले में नई सोच बनी। दूरसंचार, राष्ट्रीय राजमार्ग कार्यक्रम, ऊर्जा क्षेत्र, बैंकिंग और वित्तीय बाजार क्षेत्र में सुधार किए गए। इन सबने आर्थिक तरक्की को महत्वपूर्ण रफ्तार दी। मनमोहन सिंह के समय में पीएमओ की भूमिका में संयम देखा गया। यह साफ हो चला था कि महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों और नियुक्तियों पर फैसले पीएमओ के बाहर लिए जाते हैं। यह विडंबना ही थी कि वित्त मंत्री के तौर पर 1991 में मनमोहन सिंह बड़े आर्थिक सुधार लेकर आए, लेकिन दस साल के अपने प्रधानमंत्रित्व में वह शायद ही कोई निर्णायक आर्थिक बदलाव ला सके।

यूपीए-एक के दौरान सरकार वाम पार्टियों पर निर्भर थी, जिनका आर्थिक सुधारों पर गंभीर ऐतराज रहता है। यूपीए-दो के कुछ गठबंधन साझेदारों ने महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों को रोके रखा। कई लोग यूपीए-एक और दो के कार्यकाल को भारत का बेकार गया दशक बताते हैं। मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्तियों से कई मायनों में अलग है। पहला, देश  के हालिया राजनीतिक इतिहास में ऐसा आम चुनाव देखने को नहीं मिला था, जो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नेतृत्व पर काफी हद तक निर्भर रहा हो। दरअसल, यह मोदी-केंद्रित जीत थी, भारत के लोगों ने उनके नेतृत्व पर अपना भरोसा जताया था।

मोदी ने भी महसूस किया कि जनादेश उनके और प्रशासनिक नतीजों के लिए है। इस तरह, पीएमओ ने मोदी विजन को पाने के लिए अपने को फिर से गढ़ा है। भारत के लोगों के लिए यह कम अहमियत रखता है कि मोदी अपने पास ज्यादा शक्तियां रखते हैं या नहीं, बल्कि उनके लिए महत्वपूर्ण है कि वे निर्णायक बदलावों को महसूस कर सकें, अधिक सुरक्षा पाएं और आखिर में भविष्य के प्रति आशावाद का माहौल बने। इस मामले में मोदी का प्रधानमंत्री कार्यालय विशिष्ट है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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