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एक बार फिर ग्लैमर से दूर है दीवार

राहुल द्रविड़ ने अपने संन्यास के करीब साढ़े तीन साल बाद एक बार फिर वही जिम्मेदारी चुनी है, जो उन्होंने अपने 16 साल के करियर में निभाई। खिलाड़ी के तौर पर भी वह हमेशा एक 'शीट एंकर' की तरह या तो टीम की जीत के लिए बुनियाद रखते रहे या फिर क्रीज पर डेरा डालकर टीम को हार से बचाते रहे। अब एक बार फिर वह यही काम करेंगे। इंडिया ए और अंडर-19 की टीम के खिलाडि़यों के साथ पसीना बहाएंगे, उन्हें इस लायक बनाएंगे कि वे देश का प्रतिनिधित्व करें। लेकिन इस सारी मेहनत के बाद जब खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाएगा, तो उसके साथ नेशनल टीम के कोच का नाम जुड़ेगा और लोग भूल जाएंगे कि उसकी नींव तैयार करने वाले खिलाड़ी का नाम राहुल द्रविड़ है। ठीक वैसे ही, जैसे कई टेस्ट मैचों में जीत के बाद क्रिकेट फैंस को 'मैन अफ द मैच' तो याद रह गया, लेकिन लोग ये भूल गए कि उस जीत की बुनियाद राहुल द्रविड़ के बल्ले से निकली थी।

साल 2001 में इडेन गार्डन्स में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ फॉलोऑन के बाद भारत की ऐतिहासिक जीत में राहुल द्रविड़ के बल्ले से निकले 180 रनों को छोड़ दिया जाए, तो बहुत कम टेस्ट मैच ऐसे हैं, जिनका जिक्र आते ही तुरंत राहुल के 'हीरोइज्म' की तारीफ होती हो। राहुल ने दर्जनों टेस्ट मैच में टीम को जीत दिलाई है, टीम को हार से बचाया है, मगर बदकिस्मती से क्रिकेट के आंकड़ेबाजों को छोड़कर आम फैंस को उनकी वे ऐतिहासिक पारियां कम ही याद रहती हैं।
सच यह है कि राहुल द्रविड़ अपने पूरे करियर में ग्लैमर की मुख्यधारा से दूर ही रहे। उनकी बदकिस्मती यह भी रही कि जिस मैच में शानदार प्रदर्शन किया, उस में किसी और खिलाड़ी ने भी शानदार बल्लेबाजी कर दी। जिस कोलकाता टेस्ट में उन्होंने 180 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली, उसमें भी वीवीएस लक्ष्मण ने 281 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली थी और 'मैन ऑफ द मैच' बने। फिर जिस तरह की दीवानगी सचिन तेंदुलकर की मुंबई या सौरव गांगुली के शहर कोलकाता में थी, वैसी दीवानगी राहुल द्रविड़ के शहर बेंगलुरु ने कभी नहीं दिखाई।

राहुल द्रविड़ को तकनीकी तौर पर देश का सबसे बेहतरीन बल्लेबाज माना गया। दिग्गजों ने उन्हें सचिन तेंदुलकर से बेहतर तकनीक वाला बल्लेबाज कहा। ग्लेन मैक्ग्रा के अनुसार- अगर जिंदगी और मौत की लड़ाई के लिए बल्लेबाजी करवानी हा, तो वह लारा और तेंदुलकर के मुकाबले राहुल द्रविड़ को चुनेंगे। इसके बावजूद मैदान के बाहर द्रविड़ को लेकर कभी उस तरह की दीवानगी देखने को नहीं मिली। वह बस चुपचाप अपना काम करते रहे। राहुल द्रविड़ के क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद विदेशी पिचों पर  टेस्ट मैचों में टीम इंडिया की जैसी दुर्गति होती है, उसके बाद तो उनकी काबिलियत और ज्यादा समझ आती है। अच्छी बात यह है कि चुपचाप मेहनत का उनका यह सिलसिला अभी जारी रहेगा।    
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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