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पॉलिटिक्स कीमैगी के उलझे सिरे

पूर्णत: कृषि-आधारित पॉलिटिक्स इस मुल्क में किसी प्रदेश की है, तो वह सिर्फ बिहार की। बाकी देश तमाम मसलों पे उलझा हुआ है, पर बिहार के मुख्यमंत्री का विमर्श सीएम बंगले के आम-लीची पर फोकस है। और कितनी चिंता की जाए खेती की? वैसे बिहार की पॉलिटिक्स का हाल कुछ-कुछ मैगी जैसा उलझा हुआ है। कौन-सा सिरा कहां निकलेगा, पता ही नहीं चलता। जीतन राम मांझी उधर से भाजपा के साथ दिखते हैं, इधर से लालू यादव के साथ दिखते हैं। अंदरखाने उनकी कहीं और भी डील चल रही है। कोई बता रहा था कि नीतीश कुमार बहुत ही उदार हो गए हैं, उन्होंने लालू यादव को कह दिया है कि चलो पीएम तुम बन जाना, मुझे सिर्फ सीएम बनने दो। सच में ऐसी उदारता स्वागत के योग्य है। सब नेता इतने उदारमना नहीं हैं। जीतन राम मांझी सीएम बनने पर अड़े हुए हैं। उनके तेवर देखकर डर लगता है कि वह कहीं चीन, श्रीलंका, अमेरिका, ब्रिटेन आदि तक से डील न करने लगें कि मुझे बिहार का सीएम बनाया जाए। बिहार में चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है। पहले सीएम का चुनाव किया जाना है, फिर मंत्रिमंडल का चुनाव होगा फिर विधायक चुने जाएंगे, फिर उम्मीदवार तय हो जाएंगे, फिर...।

क्या कहा? यह प्रक्रिया उल्टी है, सही प्रक्रिया यह है कि पहले उम्मीदवार तय होते हैं। फिर विधायक चुने जाते हैं, फिर उनमें से कुछ मंत्री बनाए जाते हैं और विधायक मिलकर सीएम चुन लेते हैं। नहीं-नहीं, सही प्रक्रिया वही है, जो आजकल बिहार में चल रही है, सबसे पहले सीएम का चुनाव। मुलायम सिंह यादव की हालत उस फ्लॉप मैरिज ब्यूरो जैसी है, जिसका प्रस्तावित पहला रिश्ता ही बन नहीं पा रहा है। जनता परिवारों का विलय कब होगा, इसका मजाकिया जवाब यह आता है कि जब हर भारतीय के खाते में स्विस बैंक से वापस काले धन के 15 लाख रुपये आ जाएंगे। कोई भी मैरिज ब्यूरो अपने प्रस्तावित रिश्तों के फ्लॉप होने पर बंद हो जाता है। पर नेता मैरिज ब्यूरो नहीं होता, वह फ्लॉप रिश्तों की चिंता करता होता, तो कारोबार ही न कर पाता।

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