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कैसा रहा रिजल्ट सरकार

रिजल्ट के सीजन में टेंशन हो ही जाती है। अच्छी बात यह है कि सरकार को नहीं है। वह एकदम टेंशन फ्री लग रही है। बेचारे बच्चे 98-99 प्रतिशत नंबर ला रहे हैं, मगर मां-बाप को फिर भी चैन नहीं। सौ पर्सेंट क्यों नहीं लाए? खुद के 50 प्रतिशत से ज्यादा कभी नहीं आए, फिर भी स्यापा- की होगी कोई सिली मिस्टेक। कितना समझाया था कि बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे ले। पर नहीं जी, दोस्तों से चैटिंग तो करनी ही है। ले लिए मजे? कैंपस के कॉलेजों ने कटऑफ सौ पर्सेंट रख दी, तो एडमिशन कैसे होगा?  बच्चों के मुकाबले सरकार की हालत बहुत बेहतर है। वैसे, सरकार की हालत हमेशा ही बच्चों से अच्छी रहती है। पर संयोग से सरकार के एक साल का रिजल्ट भी अभी आया है। सरकार को अगर कोई जीरो दे रहा है, तब भी उसे कोई चिंता नहीं। अपने एक साल के रिजल्ट पर प्रधानमंत्री बेशक कह रहे हों कि सर्वे वालों ने हमें डिस्टिंक्शन के साथ पास किया है, पर राहुलजी ने तो जीरो ही दिया है।

सरकार की परफॉर्मेंस के लिए तो जीरो दिया ही, मेक इन इंडिया के बारे में भी उन्होंने कह दिया कि इसका रिजल्ट जीरो ही रहने जा रहा है। इससे तो यही लगता है कि जीरो का आविष्कार मोदी सरकार के लिए ही हुआ था। साल भर पहले भाजपा वालों ने जिस तरह उन्हें 'पप्पू' बताया था, उसका बदला वह यूं ले रहे हैं कि पप्पू तो फिर भी पास हो जाएगा, पर तुम्हें जीरो से ज्यादा मार्क्स दूंगा नहीं बच्चू। बताते हैं कि ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया की तरह अगर कोई परीक्षार्थी अपनी कॉपी बिल्कुल कोरी भी वापस कर दे, तब भी परीक्षक उन्हें पांच नंबर सफाई के जरूर दे देते हैं। राहुलजी को पांच नंबर तो सरकार को दे ही देने चाहिए थे। वैसे भी, मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों में स्वच्छता अभियान को शामिल किए हुए है। यह अलग बात है कि झाड़ू के साथ फोटो खिंचवाने का जोश अब ठंडा पड़ चुका है। मगर सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि आजकल डिस्टिंक्शन को कोई बहुत ज्यादा नहीं पूछ रहा, क्योंकि यह कटऑफ सौ पर्सेंट तय होने का जमाना है।

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