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अपने हिस्से की खुशी

अपार्टमेंट की बालकनी से कमरे तक चहलकदमी करते हुए भी समय कटता नहीं है। लोगों के मन की दूरी अकेलापन, उदासी, मायूसी और अलग-थलग महसूस करवाती है। इंडिया गेट पर घूमने, महंगे रेस्तरां में खाना खाने, डिजाइनर कपड़े पहनने के बावजूद मन की उदासी जाने का नाम नहीं लेती। हालांकि, समाज में सफलता का आधार सेहत, पैसा, परिवार, रुतबा को माना जाने लगा है। पर, आस-पड़ोस से बातचीत, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने पर जो चैन मिलता है, जो खुशी मिलती है, वह अद्वितीय है।  भारतीय जीवन दर्शन, साहित्य, कला, संगीत, सब में जीवन का जयघोष गुंजायमान है। रोजमर्रा की भाग-दौड़ में लोग भूल जाते हैं कि हम आनंदकंद परमेश्वर की संतान हैं, जो आनंद स्वरूप है। आनंद का वह गुण हमारे अंदर बीज रूप में विद्यमान रहता है। इसलिए, जीवन कितनी भी मुश्किलों और उतार-चढ़ाव से भरा हो, हमें अपनी सोच में खुशी का संचार करते रहना चाहिए। हमें खुश रखने के लिए प्रकृति ने अपना विपुल भंडार खोल रखा है। उसके रत्नों को पहचानने की जरूरत है।

अगर हमारे पास नींद का मरहम है, शांति की गोद है, उत्साह की रोशनी है, विवेक की दृष्टि है, दोस्तों के प्रेम की प्रेरणा है, तो हम जैसा सौभाग्यशाली कौन हो सकता है? आप अपने छोटे-से घर को सजाकर या अपने पड़ोसी के सुख-दुख में शामिल होकर, अपनी जिंदगी को खुशनुमा बना सकते हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति लिंकन का कहना था कि अपनी प्रसन्नता के सभी प्याले जो दूसरों को समर्पित कर दे, उससे बढ़कर धनी और कोई हो ही नहीं सकता। दरअसल, आपकी अपनी खुशी और दूसरों की प्रसन्नता बहुत जरूरी है। आप सृजनात्मक माहौल में रहें। दूसरों की कृतज्ञता स्वीकार करिए, और सिर्फ एक इंच की मुस्कान होठों पर रखिए। आपको खुद से शिकायत नहीं होगी, तो फिर औरों से भी शिकायत नहीं रहेगी।

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