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अधर और शिखर के शिकायती

हमारे ज्ञानी मित्र बताते हैं कि मानवीय जू में दुबले, मोटे, नाटे, लंबे, दादा-दबंग, डरपोक-साहसी, घुन्ने-बड़बोले दोपायों की विविधता में समानता का इकलौता तत्व स्वार्थ है। ज्ञानी विनम्र हैं। हमने हमेशा उन्हें किसी न किसी की शिकायत करते पाया है। सर्दियों में वह धूप के अभाव से पीडि़त हैं, तो गरमियों में उसके प्रभाव से। ऐसे प्राणी अधर के स्थायी शिकायती हैं। इनके अधर अधिकतर शिकायत बुदबुदाने को हिलते हैं। पेट मुफ्त के अतिभोज से पीडि़त है और वे सरकार को कोसते हैं, 'महंगाई में दावत खाकर अपराध-बोध होता है। खाना हजम हो, तो कैसे हो?' अपने देश के आम आदमी की सहन-शक्ति विद्वानों की तुलना में कहीं अधिक है। उसमें बिना शिकायत भूख, अभाव, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण झेलने का सामर्थ्य है। वहीं समर्थ को निजी लॉन में कांटा भी चुभे, तो वह बिलबिलाते हुए व्यवस्था के विरुद्ध मुखर हो जाता है, 'इत्ते घटिया जूते! क्वॉलिटी-कंट्रोल तो इस देश में है ही नहीं।'

संपन्न और सत्ताधारी, दोनों शिखर के शिकायती हैं। भारतीय चुनाव के अनपेक्षित नतीजों से कई की किस्मत खुलती, तो कई की फूटती है। एक शिखर शिकायती सत्ता पाकर बौराया-सा है। उसे दिन में समतल जमीन पर गड्ढे व रात में तारे नहीं, भ्रष्टाचार के छेद नजर आते हैं। वह सामर्थ्य भर चौतरफा शिकायतें ठोकने का विशेषज्ञ है। जाने कब और कहां निशाना सही लग जाए?  उसने अपने शिकायती आचारण और बचकाने व्यवहार से यह सिद्ध कर दिया है कि कहावतें वास्तव में बुद्धिमानों के अनुभव और जिए हुए सच का निचोड़ हैं। चुनावी वादों के क्रियान्वयन को भुलाकर वह हर प्रकार की तुगलकी तीरंदाजी में दृढ़ निश्चय और लगन से लगा है। अभी उसका लक्ष्य केंद्र को ठिकाने लगाना है। हैरत है, उसने अभी तक खुद को कैसे बख्शा हुआ है, जबकि उसके अनुसार देश का हर सत्ताधारी भ्रष्ट है। कल शायद ही किसी को आश्चर्य हो, यदि खबर आए कि इस लतियल शिकायती ने अपनी ही सरकार के खिलाफ पीआईएल दाखिल कर दी।

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  • Web Title:अधर और शिखर के शिकायती