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पॉपुलर कल्चर और मुशायरा

पॉपुलर कल्चर के मध्यकालीन अरब रूपों में मुशायरा सबसे प्रसिद्ध है। मुशायरे की परंपरा का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। इस्लाम के उदय के पहले से अरब देशों में मुशायरे हुआ करते थे। यह पुरानी पॉपुलर कल्चर का प्रभावशाली रूप है और आज भी इसकी साख बरकरार है। अरब देशों में कबाइली समुदायों के मेले, जलसों आदि के समय सामान्य जनता के मनोरंजन में इन मुशायरों की बड़ी भूमिका थी। इसके अनेक रूप हैं। एक है सीमित शायरों में शेरगोई, दूसरा है विशाल जनसमूह में शेरगोई, तीसरा है शायरों में प्रतिद्वंद्विता। इसमें खास किस्म की तुकबंदी की भी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी। ...ईरान में मुशायरे 10वीं शताब्दी में सामने आते हैं, जबकि भारत में 16वीं शताब्दी में इसका जन्म होता है।

आरंभ में फारसी जबान के मुशायरे होते थे, क्योंकि विदेश से फारसी के शायर बड़ी संख्या में भारत आने लगे थे। खासकर दिल्ली, गोलकुंडा, बीजापुर इसके बड़े केंद्र थे। लेकिन कालांतर में मुगल शासन के पतन के दौर में रेख्ते (उर्दू का पूर्व नाम) के मुशायरे होने लगे। फारसी की जगह रेख्ता ने ले ली थी। रेख्ता के मुशायरों को मुराख्ते कहा गया। आरंभ में मुराख्ते दरबार तक सीमित थे, बाद में आम जनता के बीच होने लगे। कालांतर में मुशायरे के नियम बनाए गए, कहने के तरीके तय किए गए, मसलन गजल कैसे कहें, सभ्यता और असभ्यता के दायरे तय किए गए। अध्यक्ष तय किया गया। नियमों के पालन न करने को बदतमीजी कहा गया।
नया जमाना में जगदीश्वर चतुर्वेदी

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