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अनुराग कश्यप का अगला मुकाम

दिल्ली में ऋतु परिवर्तन के दिन उखड़े और उदास होते हैं। खासकर जाड़ों की शुरुआत, जब हर ओर धुंधलकापन फैल जाता है और तन-मन पर स्याही पसरी हुई लगती है। यह उन्हीं दिनों की बात है। शाम ढल रही थी और मैं खिड़की के बाहर उचटे भाव से देख रहा था। कंप्यूटर की स्क्रीन पर देश-दुनिया की खबरें गुंथी पड़ी थीं। मौसम की मार का असर कि मन 'कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम' की ओर ताकने तक को नहीं कर रहा था। अचानक वरिष्ठ सहयोगी जयंती रंगनाथन ने अंदर झांका और बोलीं- 'सर, अनुराग कश्यप ऑफिस में हैं, वह आपसे मिलना चाहते हैं।' बेचैनी की उसी मुद्रा में मैंने पूछा- मुझसे? क्यों? उनके चेहरे पर संकोच का भाव उभर आया। वह जानती हैं कि फिल्म प्रमोशन के सिलसिले में अक्सर बड़े-बड़े सितारे दफ्तर आते हैं, पर मैं उनमें से किसी से नहीं मिलता। क्यों मिलूं? उनसे बातचीत के लिए जयंती की अगुवाई में सक्षम सहयोगियों का दल है। ऐसे में, मुझे इन स्टार्स से मिलना उनके काम में अड़ंगा डालने जैसा प्रतीत होता है। सिनेमाई सितारे ही क्यों? कार्यालय में और भी नामी-गिरामी आते हैं। अगर पहले से समय निर्धारित न हो, तो मुझे उनसे भेंट-मुलाकात में संकोच होता है। वजह वही, जिस काम के सिलसिले में वे तशरीफ लाए हैं, उसके संपादक से मिलें।

प्रसंगवश बताता चलूं कि कई साल पहले हिन्दुस्तान ने 'कलंक कथा' के नाम से रसूखदार लोगों के भ्रष्टाचार की श्रृंखला प्रकाशित की थी। उसके अतिथि संपादक थे, अरविंद केजरीवाल। तब तक अन्ना हजारे के आंदोलन और राजनीति में उनके पदार्पण के संकेत नहीं थे। 'मैगसेसे पुरस्कार' विजेता के तौर पर हम सब उनकी इज्जत करते थे, लेकिन मुझे लगता था कि इस श्रृंखला के संपादक प्रताप सोमवंशी से ही उन्हें मिलना चाहिए। इस दौरान वह कई बार आए, पर मेरा संकोच कायम रहा। खैर, हम अनुराग कश्यप की बात कर रहे थे। उस दिन न जाने क्यों जयंती नहीं टलीं। उन्होंने कहा, 'सर, मिल लीजिए, अच्छा लड़का है।' कुछ मिनटों में अनुराग सामने थे। वैसे ही, जैसे सिनेमा के परदे पर या फोटो में दिखते हैं। खद्दर का सादा कुरता, खुले बटन, जींस की पैंट, बेतरतीब दाढ़ी और बाल। बैठते ही बोले कि सर, आपसे बहुत दिनों से मिलने की इच्छा थी। जब आप आज में लिखते थे, तब भी मैं आपके लेखों को पढ़ा करता था। अगला एक घंटा हम तमाम विषयों पर बात करते रहे। वह मुझे सहज तौर पर विचारशील लगे। तब तक गैंग्स ऑफ वासेपुर रिलीज हो चुकी थी और नए निर्देशकों में उनका नाम सबसे ऊपर था। उसी दौरान उन्होंने पूछा कि वासेपुर आपको कैसी लगी? मेरा कहना था कि यार, गालियां कुछ ज्यादा तो नहीं हो गईं? उनका प्रतिप्रश्न था- आप जब मिर्जापुर में आंखें खोल रहे थे, तब आसपास के लोग क्या इससे कम गालियां बकते थे? मैं निरुत्तर! मिर्जापुर हम दोनों के बचपन का साझा केंद्रबिंदु है। स्थानों की समानताएं एक रिश्ता जोड़ देती हैं।

उस शाम अनुराग के जाने के बाद मुझे लगा कि आज अगर मैं इस नौजवान फिल्मकार से नहीं मिलता, तो जीवन में बहुत कुछ सीखने-समझने से वंचित रह गया होता। उसी दिन एक पुराने सवाल का जवाब भी हासिल हो गया। उनकी ब्लैक फ्राइडे देखकर मन में सवाल उभरा था कि यह शख्स थानों, विस्फोटों और यहां तक कि एक व्यवसायी की आत्महत्या को इतनी सरलता से कैसे फिल्मा लेता है? सत्यजीत रे के बाद पहली बार मैंने ऐसा निर्देशक देखा, जो चमत्कारों को रचता नहीं है, चमत्कार उसका पीछा करते हैं। वासेपुर के सरदार पिता-पुत्र हों, या फिर गुलाल में पीयूष पांडे, कभी-कभी आपको उनके संवादों में थोड़ी-सी असंबद्धता नजर आएगी, लेकिन अगर आप उन दृश्यों को समग्रता में देखें, तो लगेगा कि उनकी फिल्में ऐसी गजल की मानिंद हैं, जिसका हर शेर अलग अर्थ रखता है, पर समूची गजल अनोखी कहानी बयान करती है। गुलाल में पीयूष पांडे की ऊटपटांग हरकतें, संवाद और उसके साथ दो रंगों में रंगे अजीब-ओ-गरीब चरित्र की उछल-कूद अटपटी नहीं लगती। उसी फिल्म में खलनायक का रोल निभा रहे के.के. जब अपने अर्द्ध विक्षिप्त भाई पर गोली चला देते हैं, तो सन्नाटा छा जाता है।

अनहोनी की आशंका से थरथराते परिजन जब कमरे के अंदर घुसते हैं, तो आंसुओं से भीगे पीयूष और खून से लथपथ विदूषक को देखकर समझ में आ जाता है कि हमारी जनता जीते-मरते, हर हाल में कैसे ताकतवर लोगों का शिकार बनती है। असंबद्धता में संबद्धता अनुराग कश्यप की शख्सियत और उनके सिनेमा का अटूट हिस्सा है। यह उनकी साफगोई है कि वह बिना किसी लाग-लपेट बताते हैं कि सिंधिया स्कूल में उनके साथ यौन दुर्व्यवहार हुआ था और इसने उन पर गहरा असर डाला। क्या यही गुस्सा उनसे सरदार या भीखू महात्रे जैसे किरदारों की रचना करवाता है? कमाल देखिए, सत्या  का महात्रे और वासेपुर का सरदार, दोनों विद्रोही हैं, पर वे हिंदी सिनेमा के सुपरमैन जैसा व्यवहार नहीं करते। उनकी यह खूबी कभी उनके गॉड फादर रहे रामू से उन्हें अलग करती है। रामू का 'शिवा' ऐसा ही था, पर बाद में वह भटकते गए और एक दिन उनकी रचनात्मकता सूख गई। बॉम्बे वेलवेट की असफलता और मुंबई छोड़कर हमेशा के लिए पेरिस चले जाने का अनुराग का इरादा कहीं रामू के हैदराबाद गमन से तो प्रभावित नहीं? कुछ लोग ऐसा सोच सकते हैं, पर यह गलत होगा। रामू लुट-पिटकर हैदराबाद गए, जबकि अनुराग नया मुकाम गढ़ने के लिए पेरिस को बसेरा बना रहे हैं।

अपनी असल जिंदगी में दो-दो पत्नियों का साथ न निभा सकने वाले अनुराग दोस्तों के दोस्त माने जाते हैं। फिल्म नगरी में, जहां अपना साया भी प्रतिस्पर्द्धी होता है, उन्होंने दिवाकर बनर्जी, विशाल भारद्वाज और तिग्मांशु धूलिया जैसे समकालीनों से दोस्ती निभाकर साबित कर दिया कि खुद पर भरोसा हो, तो खुदी कितनी बुलंद की जा सकती है। ये चारों फिल्मकार एक-दूसरे की फिल्मों को बेहतर बनाने के लिए जी-जान लगा देते हैं। अनुराग ने तो वासेपुर  में तिग्मांशु धूलिया से अभिनय कराकर उनके व्यक्तित्व को नया आयाम दे दिया। खुद उन्होंने भी शार्गिद में गुंडे और लक बाइ चांस में एक प्रोडक्शन असिस्टेंट की भूमिका निभाकर साबित कर दिया कि उनकी गहराई परदे के पीछे और आगे, हर तरफ लाजवाब है।

अब जब अनुराग अपना बोरिया-बिस्तर बांध रहे हैं, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पेरिस उनका अंतिम मुकाम है?  क्या वह वाकई वहां इसलिए जा रहे हैं, क्योंकि रचनाधर्मियों का मक्का वही है? या यह उस पंछी की उड़ान है, जो सागर के ऊपर इस उम्मीद से पंख फैलाता है कि नया किनारा मिलेगा, लेकिन अंतहीन सागर से उसे फिर जहाज पर लौटने की प्रेरणा या, बेबसी मिलती है?

मुंबई भी हिन्दुस्तानी फिल्मकारों के लिए उस महासागर की तरह है, जो अपने रहवासियों को कहीं और नहीं जाने देती। अमिताभ बच्चन भी तो कभी न्यूयॉर्क जा बसे थे। मायानगरी ने ही उन्हें धकियाया था, पर उसी ने बिग बी को लौटने पर मजबूर कर दिया। वह जब गए थे, तब नायक थे, लौटने के बाद महानायक बन गए। क्या अनुराग भी नियति के उसी भवसागर में गोते लगा रहे हैं?
@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com

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