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एक उड़ी कल रात खबर इत्यादि

एक महामहिमावान थे। एक माननीय। परंपरा के अनुसार दोनों में ठनी रहती थी। महामहिमावान का आरोप था कि तुम नित नई खबरें क्यों बनाते हो। माननीय का कहना था कि आप तो अफवाह फैलाने लायक भी नहीं हैं, खबरें क्या बनाओगे? माननीय के अपने तर्क थे। उनका कहना था कि भरी जवानी में उन्होंने राजनीति के फटे में पांव फंसा लिया। अब क्या चिल्लाएं भी नहीं? चिल्लाने से खबर बनती है। खबर न बने, तो चैनल वाले क्या खाएं, क्या कमाएं? महामहिमावान का कहना था कि जो करना है, अपने दड़बे में करो। अपना झाड़ू संभाल के रखो।

उनका तर्क था कि जब तक सरकार का अंतिम समय न आ जाए, उसे सुहागन दिखना चाहिए। तुम अभी से विधवा विलाप क्यों कर रहे हो? महामहिमावान ने कहा कि खबरों में हंसने-हंसाने की जो परंपरा लालूजी ने प्रारंभ की थी, उसका कोना अब आपने पकड़ लिया है। अपने सरकारी सीरियल में तुम कॉमिकल रिलीफ के अलावा कुछ नहीं। उधर माननीय तो थे ही जनम-जनम के ततैये। सीधे नाक पर काटते थे। बोले- कुछ हो जाए। रहोगे आप उप ही। पाल तो द्वारपाल भी होता है। आपके कंधों पर सिर हो, तो मुकुट पहनाया जाए। अरे भई, ये कठपुतली किसकी? जवाब आया- डोर वाले की। अरे मियां बुढ़ापे में जो मिले, वही खा लो। पड़ोसी की घी की हंडिया मत देखो। अपनी लुटियंस में रहो। वाह भई वाह! थाना हमारा और दरोगा आप का?

जिस हफ्ते दिल्ली में चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार न हो, उस हफ्ते पूरे देश में सन्नाटा खिंचा रहता है। पुलिस का मनोबल गिरने लगता है। किरण बेदी आज तक परेशान हैं कि मैं पुलिस वाली होकर कैसे हार गई और फूलन देवी डकैत होकर कैसे जीत गईं? महामहिमावान और माननीय तो गुरु-गोविंद दोऊ  खड़े, काके लागूं पांव जैसी मुद्रा में हैं। दोनों को अपनी रीढ़ पर नाज है। यह सरकारी घमंड है। जहां तक खबर की बात है, दोनों उस मुकाम पर हैं, जहां उन्हें अपनी खबर नहीं है। कुछ खबरें शर्म की तरह आती हैं, कुछ सम्मन की तरह। कुछ उड़ने लगती हैं। विज्ञापन अपनी गुलेल से उन्हें मार डालते हैं।

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