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हालात और खुशी

वह अपने हालात को कोस रहे थे। और अपने दोस्त को पकाए जा रहे थे। आखिरकार दोस्त उबल पड़ा, 'तुम खुश रहना ही नहीं चाहते। तुम्हें रोने की आदत पड़ गई है।' हम अपने दुखी होने को जिंदगी के हालात से जोड़ते हैं। लेकिन सोन्या ल्युबोमर्स्की का मानना है कि हालात महज दस फीसदी ही हमारे खुश रहने पर असर डालते हैं। वह कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी की प्रोफेसर हैं। खुशी पर उनकी दो बेहतरीन किताबें हैं। एक द मिथ्स ऑफ हैप्पीनेस  और दूसरी द हाउ ऑफ हैप्पीनेस। जिंदगी है, तो हालात हमें हिलाते ही रहेंगे। कभी हालात खराब होते हैं, तो हम परेशान होते ही हैं। ठीक उस वक्त अगर हम दुखी होते हैं, तो चलेगा। लेकिन दिक्कत तब आती है, जब हम बहुत देर तक उससे चिपके रहते हैं।

हम हालात को बहुत ज्यादा अपने ऊपर लाद लेते हैं। हालात को सहजता से नहीं लेते। उसकी वजह से हालात को जितना हमें दुखी करना होता है, उससे कहीं बहुत ज्यादा वह हमें कर जाते हैं। खुश रहना मन का भाव है। हमें उसकी भी आदत डालनी होती है। एक ही जैसे हालात में दो लोग बिल्कुल अलग तरह का बर्ताव करते हैं। एक थोड़ा-सा हिला हुआ लगता है, तो दूसरा गिर ही पड़ता है। अगर हमें खुश रहने की आदत है, तो हो सकता है कि हालात हमें परेशान कर जाएं। लेकिन वे हम पर हावी नहीं हो पाते।

हम जल्द से जल्द उससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। और निकल भी जाते हैं। हालात तो हालात हैं, लेकिन हमें अपने मन पर काम करना पड़ता है। यों हम खुश रहने की कोशिश करें, तो हालात से निपटने में भी आसानी होती है। खुश रहने की चाहत रहनी चाहिए। हम जब खुश रहना चाहते हैं, तो उसकी वजह ढूंढ़ लेते हैं। हम जब खुश नहीं रहना चाहते, तो उसकी भी वजह ढूंढ़ लेते हैं।

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