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परंपरा से ही बचेगा पर्यावरण

वृक्ष है, तो मानव है। वृक्ष फलदार हो, इमारती हो या औषधीय, वह काम जीवमात्र के आता है। पशु-पक्षी, कीड़े-मकोडे़ ही नहीं, जितने भी जीव हैं, वृक्ष उनके सहयोगी हैं। उनके जीवन का आधार हैं। हम भारतीयों ने वृक्षों का इसी आस्था, विश्वास और उपयोगिताओं की समझ के आधार पर संवद्र्धन और संरक्षण किया है। हमारी बहुत सी धार्मिक आस्थाएं और सामाजिक परंपराएं इसी आधार पर बनी हैं। तीज-त्योहार के केंद्र में भी पेड़ हैं। पूरा औषधि विज्ञान तो खैर वनस्पति जगत पर निर्भर है ही।

यह धर्म और परंपरा सदियों से वृक्षों का संरक्षण कर रही है। हमने अपने पर्यावरण को उपयोगिता के अर्थशास्त्र से कम, परंपरा के प्रवाह से ज्यादा बचाया है। पीपल के स्वास्थ्यवद्र्धक होने का तर्क शायद लोगों को पीपल बचाने के लिए उतना उत्साहित नहीं करता, जितना पीपल को धार्मिक भावना से जोड़ देना। इसीलिए आज तक पीपल की पूजा होती है। कहीं भी पीपल का पौधा उग आए, तो उसे काटा नहीं जाता। काटने में लोग भय खाते हैं। तुलसी, बरगद और न जाने कितनी वनस्पतियों के साथ भी यही भाव जुड़ा है।
देश में विभिन्न फलदार वृक्ष लगाने की परंपरा रही है। वृक्ष किसी भी प्रकार का हो, लोग उसे पुत्रवत भाव से लगाते और सींचते हैं। देश के विभिन्न भागों में पुत्र या पुत्री के जन्म पर वृक्ष लगाने की परंपरा  है। वृक्षों का पालन-पोषण भी पुत्रवत स्नेह से ही होता है।
शास्त्रों में बेटा-बेटी, दोनों के लिए पुत्र का प्रयोग हुआ है। उसे सींचना, उसके स्वास्थ्य की देख-रेख करना, कीड़े-मकोड़ों या किसी की बुरी नजर से बचाना, सभी क्रियाएं वही हैं, जो एक संतान की देखरेख और उसके पालन-पोषण में हम करते हैं। संतान की तरह ही उसकी बढ़त देखकर प्रसन्नता होती है। छोटे पौधे को बकरी या कोई जानवर खा जाए, तो हमारा दिल दुखने लगता है। संतान के पालन-पोषण के पीछे जो भाव रहता है, वही वृक्ष के पालन-पोषण के पीछे भी होता है। पुत्र बड़ा होकर मां-बाप की सेवा करेगा, पितृऋण चुकाएगा, वृक्ष बड़ा होकर फल देगा। पुत्र और वृक्ष के लालन-पालन में तकलीफ होती है, मेहनत करनी पड़ती है। परंतु उस श्रम के पसीने की खुशबू भी होती है, आनंद आता है उन्हें बढ़ते देखते हुए।

पुत्र-पुत्रियां जवान होकर माता-पिता के मित्र समान हो जाते हैं- प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्र-मित्र समाचरेत। इस नीति श्लोक में पुत्र के साथ पांच वर्ष तक लाड़-दुलार, दस वर्ष तक डांट-डपट से शिक्षा देने की सीख दी गई है। लेकिन सोलह वर्ष के होते ही पुत्र भी मित्र के समान हो जाता है। मित्र की अनेकानेक परिभाषाएं दी गई हैं। दो व्यक्ति समान स्तर पर आ जाते हैं। सुख-दुख और हानि-लाभ समान हो जाता है। तुलसीदास ने लिखा है- जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहि बिलोकत पातक भारी। मनुष्य के बच्चे को बड़े होने में देर लगती है। वृक्ष तो जल्दी ही फल देने लगता है। फल देने वाला पुत्र मित्र हो ही जाता है। उसकी सुरक्षा में हम लग जाते हैं। मित्रता बहुत दिनों तक चलती है। एक लंबी अवधि के बाद फल देना समाप्त होता है। कुछ वृक्षों को रोपने वालों की अगली तीन-तीन पीढ़ियां फल खाती या छाया प्राप्त करती हैं। परदादा-दादा के लगाए फलों का रसास्वादन करती नई पीढ़ियां अपने पूर्वजों को भी स्मरण करती हुई मन ही मन आभार प्रकट करती हैं। लोग स्वयं अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी उम्र में भी वृक्ष लगाते हैं। वृक्ष हमें बहुत से संस्कार भी दे देता है।

हमारे जीवन और व्यवहार में छोटे बच्चों के शरीर में भी पैर नहीं लगाने की परंपरा और आचरण रहा है, क्योंकि ऐसी आस्था है कि पांच वर्षों तक शिशु भगवान का रूप होता है। अपने से किसी बड़े या समान उम्र को भी पांव लग गया, तो हम नमन करते हुए क्षमा मांगने के आभारी रहे हैं। वृक्ष के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता है।

हरे वृक्ष नहीं काटे जाते। जलावन के लिए भी सूखी डालियों को काटने की परंपरा रही है। आंधी-तूफान में भी यदि छोटे (जवान) वृक्ष गिर गए, तो गम मनाया जाता है। हमारे अवचेतन में यह भाव रहता आया है कि जिस प्रकार जवान व्यक्ति जिंदा रहकर पृथ्वी पर बहुत कुछ करता है, समाज को कुछ-न-कुछ देता है, उसी प्रकार जवान वृक्ष भी समाज के लिए देता ही देता है। जवान पुरुष और जवान वृक्ष के प्रति एक ही भाव होता है।
एक लोकगीत में बेटी अपने पिता से अर्ज करती है कि वह नीम के पेड़ को नहीं काटे। अभी नीम के पेड़ पर चिड़ियों का घोंसला है। उसी प्रकार बेटी को भी दुख नहीं दे, चिड़िया उड़ जाएगी और बिटिया भी पराए घर चली  जाएगी। लोकमन को जागृत करने के लिए ऐसे बहुत से लोकगीत गाए जाते रहे हैं।

वृक्ष मित्र ही नहीं, गुरु की भूमिका में भी होता है। लोग देखते हैं कि वृक्ष स्वयं अपने ऊपर आए फल नहीं खाता। दूसरों को ही खिलाता है। समाज में रहकर दूसरे लोगों के लिए भी अपना समय और साधन लगाने की शिक्षा वृक्ष (गुरु) से मिलती है। वृक्ष के पास बैठने से अपने पुरखों के साथ बैठने जैसी शीतलता मिलती है।

सहयोग, त्याग, प्रेम, बंधुत्व, फल, शीतलता और अग्नि (गरमाहट) एक साथ देने वाले वृक्ष हमारे लिए समाज के एक जीवंत हिस्से की तरह हैं। ग्रामीण जीवन में हम सिर्फ वृक्षों के साथ ही नहीं रहते, उनके साथ कई तरह के रिश्ते भी बनाते हैं। शहरी जीवन में वृक्षों से ये सारे रिश्ते-नाते टूट गए हैं। फ्लैट की बीसवीं मंजिल पर रहने वाले के पास वह जमीन ही नहीं, जिसकी कोख में पेड़ उगते हैं। वह तो बस सजावटी बोन्साई उगाकर ही उनसे रिश्ता बना सकता है।

अगली पीढ़ी को बचाना है, तो पेड़ों को बचाना ही होगा। इसके लिए कानूनी प्रावधान जरूरी हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ ही लोगों के मन में वृक्षों के प्रति सनातनी लगाव पैदा करना होगा। उनमें आस्था जगानी होगी। समाज और संस्कार में अभी इस लगाव की बेल सूखी नहीं है। जैसे वृक्ष को जल से सींचना और खाद डालना है, वैसे ही वृक्ष के प्रति हमारे सनातनी भाव को भी सींचना होगा। पृथ्वी पर वृक्षों का कम होना मात्र पर्यावरण के लिए खतरा नहीं है, यह हमारी परंपराओं और संस्कृति का मामला भी है। इसलिए पर्यावरण की सुरक्षा हमारी सहज क्रिया जैसी होनी चाहिए। वृक्ष नहीं रहे, तो हमारा समाज भी अपनी प्रकृति खो देगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 

 

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