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जंग में बिछड़े परिवार जिन्हें सब भूल गए

देश के 19वीं सदी में कदम रखते ही यह कहानी शुरू हुई। बंगाल रेजिमेंट के एक रिटायर मेजर रॉबर्ट ब्रुस ने सिंगफो राज्य में चाय का पौधा देखा। सिंगफो ब्रिटिश शासित असम और बर्मा के बीच छोटा-सा क्षेत्र था, जहां राजशाही थी। चाय का पौधा मिलने पर ईस्ट इंडिया कंपनी को लगा कि यहां चाय के बागान लगाए जा सकते हैं। इसके लिए चाय के पौधे लगाने वाले, चाय बनाने वाले, उसके डिब्बे बनाने वाले मजदूर चाहिए थे। असम में यह करने वाला कोई नहीं था। इसलिए चीन से भारी तादाद में मजदूर लाए गए। जिनकी मदद से असम और उत्तरी बंगाल में चाय के बागान स्थापित हुए। फिर लगा कि चीनी मजदूर और कारीगर बहुत महंगे पड़ते हैं, इसलिए भारतीय मजदूरों को प्रशिक्षित किया गया।

जो चीनी आ गए थे, वे यहीं बस गए। यहीं के रीति-रिवाज अपना लिए। यहीं उनकी शादियां भी हो गईं और फिर एक नया असमी-चीनी समुदाय पैदा हो गया। यह जो नई नस्ल पैदा हुई, उसका क्या हुआ? असम की प्रसिद्ध इतिहासकार रीता चौधरी ने जब इस पर शोध किया, तो इस समुदाय के दुख-दर्द सामने आए। ज्यादातर चीनी आजादी से बहुत पहले असम और बंगाल में आकर बसे थे, लेकिन बहुत कम को भारतीय नागरिकता मिली थी। कुछ के पास चीन का पासपोर्ट था, तो कुछ के पास कुओमिनतंग का पासपोर्ट था, बल्कि ज्यादातर पासपोर्ट के बिना थे। ज्यादातर अनपढ़ थे, जो बढ़ई, फिटर्स और चाय बागान में मजदूर थे। उन्हें राजनीतिक परिवर्तन की कोई जानकारी नहीं थी। उन्हें नहीं मालूम था कि ब्रिटिश शासन नहीं रहा। तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कभी लोकसभा में इन सबको मुख्यधारा में लाने की बात कही थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं। इस असमी-चीनी समुदाय की कहानी को 1962 की भारत-चीन जंग ने बेहद दुखद और मार्मिक बना दिया।

सभी को गिरफ्तार करके राजस्थान के देवली नामक जगह पर लाया गया, जहां उनके लिए कैंप लगाया गया था। फिर चीन से बात हुई और सभी को चीन भेज दिया गया। पर किसी की पत्नी यहां रह गई, किसी का पति, किसी का पिता यहां रह गया, तो किसी की मां। ऐसी ही चार साल की एक बच्ची थी लियोंग लिन ची। जो मकुम की चीना पट्टी में रहती थी। वह तब अपने नाना के घर गई हुई थी, जब उसके माता-पिता को गिरफ्तार कर देवली कैंप भेज दिया गया था। नानी को पता चला, तो वह बच्ची को देने रेलवे स्टेशन दौड़ी, पर ट्रेन छूट गई थी। लियोंग लिन ची आज 57 साल की हैं, अब उनका नाम प्रमिला दास है। पिछले दिनों प्रमिला दिल्ली आई थीं। जब प्रधानमंत्री मोदी चीन यात्रा पर थे, प्रमिला गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलीं। प्रमिला ने 53 वर्ष से अपने मां-बाप को नहीं देखा। वह चाहती थीं, उन जैसे बिछड़े परिवारों को मिलाया जाए। भारत-चीन के रिश्तों में नए दौर की शुरुआत हो रही है। क्या 1962 के बिछडे़ परिवार नहीं मिल सकते?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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