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मैगी की याद में दो मिनट का मौन

जैसे ही मैगी में खतरनाक मिलावट की बात आई, हममें से ज्यादातर के चेहरे पर कुछ ऐसे भाव थे, मानो जिस लड़की को बरसों तक दिलो-जान से प्यार किया, वह अचानक ही दगा दे गई। पुरानी फिल्मों की हीरोइन की तरह नहीं बोलते हुए दोनों कानों को हाथों से ढकते हुए हम चिल्लाए कि कह दो कि यह झूठ है और सामने से आवाज आई...काश! मैं ऐसा कह पाती।

यह सुनते ही हम गश खाकर वहीं गिर पड़े। साथ ही ढह गया वह आत्म-सम्मान, जब सिर्फ इसी मैगी के भरोसे भरी महफिल में सीना ठोक कर कहा करते थे कि हां, मुझे भी खाना पकाना आता है। वह मैगी ही थी, जिसके दम पर रात को खाना पकाती बीवी के गुस्से से ललकारने पर हम भी गुस्सा होकर कह दिया करते थे... मुझे तुम्हारे हाथ का बनाया खाना ही नहीं खाना है। इतनी गैरत, इतना कॉन्फिडेंस सिर्फ इसलिए, क्योंकि पता था कि घर में मैगी रखी है। आज जब बीवियों के साथ झगड़ों में मर्दों का इकलौता हथियार मैगी भी उनसे छीन लिया गया है, तो हमारी हालात जय-वीरू के दम पर बागी हुए रामगढ़ के उस हरिया की तरह हो गई है, जिसे अकेला पाकर गांव के बाहर गब्बर के गुंडों ने धर लिया है।

औरतों को तो यह लगता है कि मैगी के मूल विचार में ही उनकी सौत छिपी है। मर्द की शिकायत यह है कि बीस बार कहने पर भी उनकी बीवी दो घंटे से कम में तैयार नहीं होती, जबकि मैगी की तो खासियत है कि यह सिर्फ दो मिनट में तैयार हो जाती है। और आज जब मैगी एक के बाद एक राज्य में फेल हो रही है, तो मुझसे यह देखा नहीं जा रहा।

सोचता हूं, नेस्ले की बजाय अगर मैगी सीबीएसई बोर्ड की तरफ से परीक्षा में बैठती, तो 90 फीसदी अंकों के साथ पास हो जाती। तब बैन की बजाय इसे हर जगह एडमिशन मिल जाता। आम इंसान करे, तो क्या करे... नेताओं पर भरोसा करे, तो वे धोखा दे जाते हैं, अभिनेताओं पर करे, तो वे गाड़ी चढ़ा देते हैं, खिलाड़ियों पर करे, तो वे वक्त पर चलते नहीं... ले-देकर मैगी बची थी, अब वह भी बेवफा निकली।

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