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इतिहास बनाने का एक अवसर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी बांग्लादेश दौरे को ऐतिहासिक माना जा रहा है। लंबे समय से लंबित भारत-बांग्लादेश सीमा समझौते को संविधान संशोधन की अनुमति मिलना मील का पत्थर रहा है, इसलिए यह दृष्टिकोण बना है। हाल के वर्षों में कई गलत पहलकदमियों और दोनों देशों के बीच हुई उच्च स्तरीय द्विपक्षीय वार्ताओं को देखने के बाद मोदी की शनिवार से शुरू होने वाली यात्रा को खास महत्व दिया जा रहा है। वैसे तो कोई यात्रा अपने आप में ऐतिहासिक नहीं होती; बल्कि उसके नतीजे और उसके बाद जो कुछ होता है, वह उसे वास्तव में ऐतिहासिक बनाता है।

इस हिसाब से भारत-बांग्लादेश संबंधों के ताजा इतिहास में सीखने के लिए बहुत कुछ है। पिछली सरकार के कार्यकाल में ही कई सारी कोशिशें और पहल हुई थीं। दुर्भाग्य से, भारत सरकार और इसके नौकरशाह, दोनों उन कोशिशों को अगले तार्किक कदम की ओर ले जाने में विफल रहे। पड़ोसी से परस्पर संबंधों में एक तरह का पैटर्न रहा है कि कुछ अच्छी सफलताओं के बाद नई दिल्ली के रवैये में लंबी उदासीनता आ जाती है।
इस पैटर्न में फंसने से मोदी सरकार को बचना है। उनकी यह यात्रा सार्थक होनी चाहिए, क्योंकि कुछ घोषणाओं, तस्वीरों और बयानों से बेहतर रिश्ते नहीं बनते। इस लिहाज से मोदी को अपने साथ अधिकारियों और सीमावर्ती राज्यों, खास तौर पर पश्चिम बंगाल और समूचे पूर्वोत्तर को अपने साथ लेना पड़ेगा। ढाका का रास्ता कोलकाता, शिलांग, अगरतला और गुवाहाटी से होकर ही जाएगा। 

अपने साथ राज्यों को जोड़ने से ही मोदी को पड़ोस-नीति में कामयाबी मिलेगी और इस मायने में वह सफल होते मालूम पड़ते हैं, जबकि उनके पूर्ववर्ती विफल। वह ममता बनर्जी को इस दौरे पर ले जा रहे हैं। पुरानी सरकार ने बांग्लादेश के साथ सकारात्मक संबंध बनाने की दिशा में पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी को नजरअंदाज करने की भयंकर भूल की, जबकि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। खास तौर पर द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े गंभीर मसलों को देखते हुए, जैसे: भूमि हस्तांतरण, सरहद पर आबादी व वस्तुओं का कानूनी तथा गैर-कानूनी प्रवेश और पश्चिम बंगाल व बांग्लादेश का साझा सांस्कृतिक इतिहास। इससे यह लगता है कि नरेंद्र मोदी दोनों देशों के बीच की बुनियादी जटिलता समझते हैं।

यह भी लगता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को अपने साथ लेकर मोदी इस जटिलता को एक अवसर का रूप देना चाहते हैं। कोलकाता व पूर्वोत्तर को ढाका से जोड़ने वाली ज्यादातर प्रस्तावित परियोजनाएं और ढाका-शिलांग-गुवाहाटी बस सेवा इस सरकार के लिए बुनियाद की तरह है, जिस पर एक बड़ा ढांचा खड़ा हो सकता है।
इससे इतर भी कई बातें हैं, जिनको समझना होगा। पहली, अगर ढाका की शेख हसीना सरकार को भारत-समर्थक देखा जा रहा है, तो बांग्लादेश में काफी भारत-विरोधी तत्व भी हैं। विपक्षी सियासी पार्टियों से लेकर, खास तौर पर खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी, बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में, मीडिया और सिविल सोसायटी के कुछ धड़ों में भी भारत-विरोधी भावना बढ़ रही है।

मजबूत भारत-बांग्लादेश संबंध न सिर्फ मौजूदा सरकार को बल देगा, बल्कि बढ़ती भारत-विरोधी भावनाओं को दूर करने में हमारी सरकार की मदद भी करेगा। गलियों में क्या कुछ हो रहा है और कैसे एक खेल आयोजन के दौरान मीडिया इसे पेश कर रहा है, यह सब बता देता है कि भारत के बारे में कई बांग्लादेशियों के मन में गलत धारणाएं पनप रही हैं। गौरतलब है कि विश्व कप क्रिकेट के दौरान भारतीय टीम के हाथों बांग्लादेशी टीम के हारने पर अंपायरिंग को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ था। इस लिहाज से सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह समझौतों को तार्किक नतीजे तक ले जाए। शासन के स्तर पर एक मजबूत द्विपक्षीय संबंध बाद में एक समाज से दूसरे समाज के बीच संबंध निर्माण के तौर पर विकसित हो जाएगा।

दूसरी बात, विदेश नीति के नजरिये से सुदृढ़ भारत-बांग्लादेश संबंध नई दिल्ली की 'ऐक्ट-ईस्ट' नीति को कामयाब बनाने के लिए जरूरी है। भौगोलिक स्थिति और आवाजाही से जुड़े मसलों को देखते हुए, पूर्वोत्तर के साथ बांग्लादेश को भी दक्षिण-पूर्वी एशिया का प्रवेश-द्वार समझा जाना चाहिए।

लंबे समय तक भारत पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्वी एशिया का अपना प्रवेश-द्वार बनाने का प्रयास करता रहा। हालांकि, उसका बड़ा क्षेत्र म्यांमार से लगता है। लेकिन हकीकत में, यह तरीका बाकी भारत को दक्षिण-पूर्वी एशिया से नहीं जोड़ता, क्योंकि बांग्लादेश बाकी भारत और म्यांमार के बीच है। आर्थिक और सामरिक रूप से यह भारत के लिए सही होगा कि वह पूर्वोत्तर के साथ बांग्लादेश को भी प्रवेश-द्वार माने। असल में, यह बांग्लादेश के लिए ज्यादा सही होगा कि वह अपने से पूर्वोत्तर के लिए प्रवेश-द्वार बने और कोलकाता बंदरगाह को गुवाहाटी से लेकर अगरतला तक से जोड़ने में योगदान दे।

तीसरी बात, मजबूत भारत-बांग्लादेश संबंध इस मायने में भी जरूरी है कि दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते कदम नई दिल्ली के लिए हानिकारक न हो पाएं। वैसे, इस क्षेत्र के सभी देशों को अपनी विदेश नीति बनाने और उनको अमल में लाने की संप्रभुता है। लेकिन ऐसी कवायद दक्षिण एशिया में भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और आर्थिक संबंधों को प्रभावित न करे, इसके लिए भारत को सतर्क रहना होगा। बांग्लादेश में एक तबका है, जो अपने नेतृत्व पर चीन की तरफ झुकने का दबाव बना रहा है। दरअसल, भारत को चुनौती देना ही इस तबके का मुख्य उद्देश्य है। यह तबका भारत-विरोधी तो है ही, साथ में चीन को एक बड़े अवसर के तौर पर भी देखता है। न सिर्फ बांग्लादेश, बल्कि नेपाल, श्रीलंका और मालदीव में भी यह खतरनाक प्रवृत्ति दिखती है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऐसा ढांचा खड़ा कर सकती है, जो इस तबके को कमजोर करेगा।

अंत में, एक मजबूत द्विपक्षीय संबंध लोगों की आवाजाही से जुड़ी संवेदनशील समस्याओं को दूर करने के लिए अनिवार्य है, खास तौर पर घुसपैठ के लिए। वैसे राजनीतिक तौर पर ऐसा रुख अपनाना आसान होता है, जिसे कानून का समर्थन हासिल हो। हकीकत यह है कि दुनिया भर में लोग इधर से उधर जा रहे हैं। इसलिए इस पर सख्त रवैया अपनाना भारत के लिए मददगार नहीं होगा; और न ही मजबूत और भारी चौकसी वाली सरहद के जरिये भारत घुसपैठ और अवैध कारोबार को रोक पाएगा। अच्छी सीमा अच्छे पड़ोसी नहीं बनाती, बल्कि अच्छे पड़ोसी अच्छी सीमा बनाते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका यह दौरा दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्ते की बुनियाद रख पाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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