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मानसून की राजनीतिक प्रतिबद्धता का खेल

खबर यह है कि इस साल भी मानसून गड़बड़ हो सकता है। ऐसा हुआ, तो मोदी सरकार के अब तक दोनों मानसून गड़बड़ हो जाएंगे। इसके पहले जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तो दस साल में एकाध बार ही मानसून खराब रहा था। राष्ट्रमंडल खेल वाले साल तो ऐसी बारिश हुई कि लगा सारा खेल ही बिगड़ जाएगा। इसकी वजह शायद यह है कि जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तो मौसम यह सोचता होगा कि यह तो कुछ करने से रहे, जो कुछ करना है मुझे ही करना है। मोदीजी के राज में ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ही सब कुछ कर डालेंगे, ऐसे में मौसम भी थोड़ा लापरवाह हो गया है। मोदी के अंदाज से तो यह भ्रम हो जाता है कि वह बारिश भी करवा सकते हैं- मेक इन इंडिया। फिर प्रशांत महासागर से आने वाले मानसून की क्या जरूरत?

शायद मानसून धर्मनिरपेक्ष है, जिसे आजकल हिंदुत्ववादी हिकारत से 'सिकूलरिस्ट' कहते हैं। मानसून जब बरसता है, तो धर्म-जाति किसी की परवाह नहीं करता। हिंदू के मकान पर भी वैसे ही बरसता है, जैसे मुसलमान के मकान पर। ब्राह्मण हो, दलित हो, पिछड़ा हो, सब पर बराबर बरसता है। कट्टरवादी होता तो किसी घर पर बरसता, किसी पर नहीं। मुस्लिम कट्टरपंथी होता, तो सीधे सीरिया या इराक जा पहुंचता, आजकल तो पाकिस्तान फैशन में है नहीं। हिंदुत्ववादी होता, तो चुन-चुनकर हिंदुओं को उपकृत करता। आजकल के माहौल में हो सकता है कि मांसाहारियों का बहिष्कार कर देता। ऐसे में, सारे तटीय प्रदेश, उत्तर-पूर्व भारत और बाकी भारत के बड़े हिस्से का बहिष्कार हो जाता, यानी हर साल देश के लगभग एक चौथाई हिस्से में ही बारिश होती। हिंदुत्ववादी नजरिये को बहुत उदार बनाकर खींच लिया जाए, तब भी इतना ही देश इनके लिए स्वीकृत हो सकता है।
लेकिन मानसून संकीर्ण धर्मनिरपेक्ष भी नहीं है। वह हिंदुत्ववादियों पर भी बरसता है, गुजरात में बरसता है, मध्य प्रदेश में भी बरसता है। वह बराबरी का हिमायती है, मगर वामपंथी नहीं है। वह मोदीजी के राज में भी जरूर बरसेगा, चाहे उसे 'सिकूलरिस्ट' ही क्यों न कहा जाए।

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