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संबंध और शोषण

पुरानी हिंदी फिल्मों में अक्सर बूढ़ी मां अपने जवान बेटे को यह कहती सुनाई देती कि बेटा, अब मुझसे घर के काम नहीं होते, तू जल्दी से एक बहू ले आ, जो घर संभाल ले। नकली किचेन सेट पर खाना बनाने का खेल करते-करते मैं अचानक इस सच से घबरा जाती कि लड़कियों को सारी जिंदगी दूसरों के लिए खाना बनाना पड़ता है। नौ-दस साल की उम्र तक इस कोटि के संवादों का मैंने यह अर्थ निकाल लिया कि पति-पत्नी में मालिक-मजदूर का संबंध होता है। पत्नी की सारी सेवाएं मुफ्त होती हैं, क्योंकि उसे उससे भी ज्यादा यानी एक घर फोकट में मिला होता है, जबकि पति नोट कमाकर लाता है और वह भी बाहर की जालिम दुनिया से टकराकर, जिससे टकराने का हुनर पत्नी के पास होता नहीं है। हमारी गली की औरतें अपने-अपने पतियों के काम पर निकल जाने के बाद सुकून में दिखतीं, शाम ढले गली में सुस्तातीं और पतियों के आने पर एक मुस्तैद गुलाम की तरह हर बात से यह जताने की कोशिश करतीं कि उन्होंने पति की गैर-मौजूदगी में बहुत सारा काम कुशलता के साथ किया है। कुल मिलाकर यह कि समझदार होने से पहले ही मैं एक धारणा बना चुकी थी कि आदर्श भारतीय विवाह संस्था में घरेलू पत्नियों और पतियों का संबंध मजदूर-मालिक संबंध से मिलता-जुलता है। दोनों में शोषण है, पर मजदूर के वेतन के स्थान पर अक्सर पत्नी के श्रम का मूल्य एक संबंध के बने रहने की गारंटी, एक सतही-सा दांपत्य प्रेम व कुछ मटमैले मेडल, जो संदूकची की शोभा बढ़ाने के काम आते हैं।
नीलिमा चौहान की फेसबुक वॉल से

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