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विश्व व्यवस्था का बदलता खेल

यह समझने के लिए आपको ताइक्वांडो का ब्लैक बेल्ट होना जरूरी नहीं है कि सबसे तगड़ी लड़ाई ब्लेजर पहनने वालों में ही होती है। 1980 तक इस कोरियाई मार्शल आर्ट का आयोजन करने वाले दो स्पर्द्धी अंतरराष्ट्रीय फेडरेशन थे, आज इसके बहुत सारे गुट बन चुके हैं। उधर बॉक्सिंग में चार अलग-अलग संगठन हैं, जो आपको 'विश्व चैंपियन' का खिताब दे सकते हैं।

इस हिसाब से फीफा यानी फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल फुटबॉल एसोसिएशन अभी तक एक अजूबा ही था- दुनिया का ऐसा खेल संगठन, जो कभी टूटा नहीं था। बेशक इसके लिए स्पॉन्सरशिप से हासिल पैसा दिल खोलकर लुटाया जाता था, ताकि राष्ट्रों के छोटे-छोटे संघ केंद्र के प्रति वफादार बन सकें। विश्व एकाधिकार का यह सबसे अच्छा उदाहरण है, मगर पिछले हफ्ते इसका वह तंत्र टूट गया, जिसके लिए लगता था कि उस तक किसी राष्ट्र के कानून के हाथ नहीं पहुंच सकते। अगर कोई देश भ्रष्टाचार का आरोप लगाता या फिर अपनी ताकत दिखाता, तो उसे बाहर कर दिए जाने की धमकी मिल जाती। लेकिन अब यह साफ हो गया है कि फीफा पर राष्ट्रों के कानून लागू हो सकते हैं। इसके अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का अब चाहे जो भी नतीजा हो, लेकिन यह रास्ता फीफा को तोड़ देगा। और अगर यह टूटता है, तो उसके बाद जो कुछ भी सामने आएगा, उस पर विश्व राजनीतिक व्यवस्था की छाप होगी।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई के फीफा को दबोचते ही रूस ने जिस तरह से उसकी निंदा की, वह बताता है कि चीजें किस तरफ जा रही हैं। ट्विटर पर जिस तरह से व्लादिमीर पुतिन के समर्थकों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं, उनमें भी इसकी झलक मिल गई। सोमवार को जब सेप ब्लाटर के नेतृत्व को लेकर मतदान हुआ, तो वोट डालने वाले पूरब और पश्चिम के भूगोल में बंटे हुए थे। यह शीत युद्ध की तरह नहीं है, मगर दुनिया कुछ इसी तरह से बंटती हुई दिख रही है।

लेकिन ग्लोबलाइजेशन के फलसफे और दुनिया के भू-राजनीतिक आधार पर बंट जाने में जो अंतर्विरोध व टकराव है, फीफा उसका एक ताजा उदाहरण भर है। यूरोपीय टेलीविजन पर चलने वाले रियलिटी शो यूरोविजन सांग कांटेस्ट  का ही उदाहरण लीजिए। पांच साल में ही यह एक भद्दे सियासी तमाशे में तब्दील हो गया। अब इसमें संगीत की स्पर्द्धा कम होती है, पूर्वी यूरोप के लोग अपनी वफादारी का गंदा प्रदर्शन कहीं ज्यादा करते हैं।
यही इंटरनेट के साथ हो रहा है। यह दुनिया को लगातार बांटता जा रहा है। मानव आबादी का पांचवां हिस्सा यानी चीन के लोग इस पर ऐसी कोई चीज सर्च नहीं कर सकते हैं, जो वहां की सत्ताधारी पार्टी को संवेदनशील लगती है। यही तुर्की में हो रहा है। पिछले दो साल से जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच तुर्की में इस विश्व व्यवस्था को बार-बार बंद किया जाता रहा है, क्योंकि इसका नियंत्रण अमेरिकी और ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। उधर ब्राजील अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया प्रयासों से बचने के लिए पुर्तगाल और अंगोला में अपनी फाइबर ऑप्टिक केबल बिछा रहा है। इस बीच सर्च के भी नए-नए रूप सामने आ रहे हैं, खासकर अंग्रेजी के उन खबरिया चैनलों के कारण, जो तरह-तरह की क्षेत्रीय ताकतों ने शुरू किए हैं। अल जजीरा  ने अभी दोहा में अपने पत्रकारों की छंटनी शुरू की ही थी कि तुर्की के राष्ट्रपति ने खबरिया चैनल शुरू करके उन सबको अपने यहां रख लिया। निरंकुश शासकों द्वारा शुरू किए गए चैनलों की कोशिश यही रहती है कि उनका प्रचार सच की तरह लगे, वे विश्वसनीय बनने की कोशिश में नहीं पड़ते। उनका पहला काम होता है सोशल मीडिया पर जो कहा जा रहा है, वे उसका जवाब दें।
हममें से जिन लोगों ने 1990 के दशक में ग्लोबलाइजेशन का उत्थान देखा है, वे मानते थे कि यह आर्थिक व्यवस्था है, इसलिए अगर यह ध्वस्त होगी, तो सबसे पहले आर्थिक कारणों से। दूसरा कारण विश्व राजनीति हो सकती है और बहुत बाद में हो सकता है कि दुनिया की विचारधाराएं इसके लिए समस्या खड़ी करें। लेकिन यह सोच पूरी तरह गलत साबित हुई। लेहमन ब्रदर्स के संकट (उसकी वजह से आई आर्थिक मंदी) के बाद बहुत सी चीजें बदल गईं, लेकिन विश्व बाजार बिखरा नहीं। इसकी बजाय खेल, संगीत, समाचार, सेंसरशिप और जासूसी की विश्व व्यवस्थाएं बिखरने लग गईं।

फीफा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है कि विश्व व्यवस्था में अर्थशास्त्र के जरिये क्या हासिल किया जा सकता है। ऐसे संगठन शत्रुता को एक औपचारिक मंच देते हैं, खेल के उनके नियम बहुत साफ और सबको पता होते हैं, वे विरोधाभास को भी नियंत्रित रखना जानते हैं। लेकिन समस्या तब आती है, जब समय बीतने के साथ-साथ उनकी मूल संरचना वही रहती है, जबकि भू-राजनीति बदल जाती है। जब वैश्वीकरण शुरू हुआ था, तो यह माना जा रहा था कि कुछ समय के भीतर ही दुनिया भर के देशों में भ्रष्टाचार कम होगा और लोकतंत्र बढ़ेगा, क्योंकि बाजार कानून के शासन में ही अच्छी तरह चल सकता है। इसके साथ ही बड़े-बड़े ग्लोबल ब्रांड बने, यह माना गया कि ये ब्रांड अगर गलत लोगों के साथ काम करेंगे, तो उनकी साख को धक्का लगेगा। लेकिन दुनिया भर में पूंजी के साथ जो हुआ, उसे फीफा प्रकरण ने बहुत ही नाटकीय रूप में दिखा दिया। दुनिया का एलीट वर्ग भ्रष्टाचार को लेकर खुश है, इसके साथ ही उसने सेंसरशिप में वृद्धि, प्रचार करने वाले टीवी चैनलों व आंदोलनकारियों पर चलने वाले फौजी डंडे की बीच रहना सीख लिया है।

कभी फुटबॉल का विज्ञापन पश्चिम के साफ-सुथरे उपभोक्ता ब्रांड के साथ होता था, अब यह गैजप्रोम जैसी कंपनी के साथ भी होता है। यह कंपनी खुले तौर पर उस तानाशाह से जुड़ी है, जिस पर अमेरिका ने पाबंदी लगाई है। ग्लोबलाइजेशन ने दुनिया के ज्यादातर हिस्सों को पश्चिम के जैसा नहीं बनाया। बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता और कानून का शासन जैसे पश्चिम के आदर्श इन देशों से और दूर चले गए।

अब ज्यादा आशंका यही है कि दुनिया में फीफा जैसे दो या तीन संगठन हो जाएंगे। कुछ वैसे ही, जैसे इंग्लिश प्रीमियर लीग में हुआ। हो सकता है कि ये संगठन ज्यादा साफ-सुथरे और कंपनी मूल्यों के प्रति ज्यादा समर्पित हों। यह भी हो सकता है कि वे ज्यादा कमाई कर लें। लेकिन वे सही अर्थों में ग्लोबल नहीं होंगे। फीफा में आप दुनिया के पूंजीवाद का भविष्य देख सकते हैं।
साभार- द गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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