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कैसे कोच की जरूरत है टीम इंडिया को

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने पिछले दो दिनों में दो बड़े ऐलान किए हैं। पहला बड़ा ऐलान भारतीय टीम के बांग्लादेश दौरे के लिए रवि शास्त्री को डायरेक्टर नियुक्त किए जाने का है। दूसरा बड़ा ऐलान सचिन तेंडुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण को क्रिकेट सलाहकार समिति का हिस्सा बनाना है। दोनों फैसले ऐसे वक्त में आए हैं, जब भारतीय क्रिकेट टीम के लिए एक नए कोच को चुने जाने की प्रक्रिया भी चल रही है। मौजूदा कोच डंकन फ्लेचर का करार खत्म हो चुका है। फ्लेचर की अगुवाई में भारतीय टीम ने ऐसी कोई बड़ी कामयाबी भी नहीं हासिल की है, जिसकी बदौलत उन्हें कोई टीम के साथ बनाए रखने की वकालत करे। बीसीसीआई कई पूर्व खिलाडि़यों के भी संपर्क में है। कई विदेशी दिग्गज आईपीएल में टीमों की कोचिंग करते हैं। ऐसे में, बीसीसीआई के सामने विकल्प भी कई हैं। लेकिन कोच चुनने से पहले यह समझने की जरूरत है कि टीम इंडिया की जरूरत क्या है?

पिछले डेढ़ दशक में भारतीय क्रिकेट टीम में करीब आधा दर्जन खिलाड़ी ऐसे रहे हैं, जिन्हें खेल की बारीकियां सिखाने का दावा शायद ही कोई दिग्गज खिलाड़ी कर पाए। सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, सौरव गांगुली, अनिल कुंबले जैसे खिलाड़ी इसी श्रेणी में आते थे। लगभग इसी समय में भारतीय टीम के लिए कुछ देसी कोचों के अलावा जॉन राइट, ग्रेग चैपल, गैरी कर्स्टन और डंकन फ्लेचर को लाया गया। कामयाबी के लिहाज से इसमें पहले नंबर पर गैरी कर्स्टन आते हैं, जबकि दूसरे नंबर पर जॉन राइट। गैरी कर्स्टन की कोचिंग में टीम इंडिया ने साल 2011 का विश्व कप जीता, जबकि जॉन राइट की अगुवाई में टीम इंडिया साल ने 2003 के विश्व कप में फाइनल मुकाबले तक का सफर तय किया था। सबसे खराब तजुर्बा ग्रेग चैपल का रहा, जिनका खिलाड़ी के तौर पर कद सबसे बड़ा था।

अनुभव यही बताता है कि टीम इंडिया को ऐसा कोच चाहिए, जो खिलाडि़यों के हिसाब से चले, क्योंकि अगर उसने भारतीय टीम को अपने हिसाब से चलाना शुरू कर दिया, तो बात बिगड़ जाएगी। उसे ऐसा कोच चाहिए, जो 'बैक सीट' पर बैठने के लिए तैयार हो। जो खुद स्टार बनने की बजाय 'लो प्रोफाइल' रहकर खिलाडि़यों के साथ काम करे। जो सर्कस के रिंगमास्टर की बजाय किसी ऑर्केस्ट्रा के संगीत-निर्देशक की तरह बर्ताव करे। मौजूदा टीम में विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दुनिया भर के रिकॉर्ड्स अपनी झोली में रखने वाले खिलाड़ी हैं, इन्हें क्रिकेट सिखाने की नहीं, बल्कि छोटी-मोटी बातें बताने वाला कोच चाहिए। ऐसे में, रवि शास्त्री को भले ही यह जिम्मेदारी कुछ दिनों के लिए दी गई हो, लेकिन वह खिलाडि़यों की रग-रग से वाकिफ हैं। फिर उनके पास 'स्टारडम' का भी अच्छा अनुभव है। इस वैकल्पिक इंतजाम को लंबे समय के लिए आजमाने में कोई हर्ज नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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