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पैसों से प्यार

पैसे से उन्होंने हमेशा प्यार किया है और पैसे वालों से हमेशा से नफरत। ये प्यार और नफरत विरोधाभासी हैं। नफरत ही है, जो उन तक पैसों का प्रवाह आने नहीं देती। कैसे? वॉरेन बफेट ने एक बार कहा था कि हमें पैसा वाला बनने से सबसे अधिक हमारे विरोधाभासी विचार रोकते हैं। उन्होंने कहा कि पादरी और धर्मगुरुओं ने धन को लेकर एक नकारात्मक छवि बनाई और यह छवि दुनिया के एक बड़े हिस्से में गरीबी-भुखमरी की वजह बन गई।

दरअसल, वॉरेन ने एक मनोवैज्ञानिक बात कही है। ज्यादातर मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि आप पैसे को लेकर अगर नकारात्मक रवैया रखते हैं, तो यह आपको यथास्थितिवाद की ओर धकेलता है और हम अपनी आर्थिक परेशानियों से उबरने की नहीं, बल्कि आदतन उससे तालमेल बिठा लेने की स्थिति में ढल जाते हैं। यही कारण है कि पैसे को लेकर जिन मुल्कों में विरोधाभासी विचारों का बोलबाला है, वहां गरीबी अधिक है। चिंतक जोसेफ मर्फी कहते हैं कि गफलत न पालें। जिस तरह से आपको ईश्वर ने सदाचारी रहने का निर्देश दिया है, वैसे ही पैसे वाले होने का भी। आप अपनी मानसिकता में समृद्ध और धनी होने के विचार रख पैसे की चेतना विकसित कर सकते हैं। मर्फी आगे कहते हैं कि पैसे की भावना से दौलत उत्पन्न होती है। अवचेतन मन एक बैंक की तरह है, यह हर उस चीज को बढ़ा देता है, जो इसमें जमा की जाती है। भले ही यह पैसे का विचार हो या गरीबी का।

अपना पूरा बचपन गरीबी में बिताने वाले चार्ली चैपलिन अक्सर यह कहा करते थे कि गरीबी एक मानसिक रोग है और गरीबी को दुत्कारने की भावना का न होना घोर पागलपन। लेकिन दौलत कमाने से कहीं अधिक दौलत के दर्शन को समझना जरूरी है। दौलत को प्रवाहमान होना चाहिए। गांधीजी ने कहा था कि धनिक समाज के ट्रस्टी हैं। गांधीजी की बात से जोसेफ मर्फी भी सहमत हैं और बफेट भी।

 

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