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किसान की जमीन

इस मुल्क की बुनियाद ही जमीन है। और यह जमीन देश के किसानों की है। किसान गांवों में रहता है। गांव का किसान और उसकी जमीन के बीच लेन-देन का पुराना रिश्ता है। वह जितना जमीन से लेता है, उसकी भरपायी जमीन को देकर करता भी है। ढोंगी पाखंडियो, जमीन की कीमत समझ लो। भारत एक खोज  में पंडित नेहरू लिखते हैं कि महाभारत काल में पहली बार जमीन की कीमत समझी गई, और उसके बंटवारे को लेकर युद्ध हुआ। इसके पूर्व जमीन थी, लेकिन उसकी महत्ता नहीं थी। महत्ता और सामर्थ्य- गो धन, गज धन से देखा जाता था। इतिहास बोध की यह धारा कांग्रेस की रीढ़ बनी और गांधीजी ने समूची कांग्रेस को गांव की ओर मोड़ दिया। गांव-स्वराज का उनका सपना मुल्क के मुस्तकबिल के साथ जुड़ गया और आज तक जारी है। शहर और गांव की बुनावट को गौर से देखो, तो समझ में आ जाएगा कि शहर शोषण और लूट की हट्टी के अलावा और कुछ नहीं, जबकि गांव परस्पर समझ व समरसता से विनिमय का विस्तार है। बापू कहते हैं, गांव गरीबी झेल सकने की ताकत तो रखता ही है, शहर को भी जीवन देता रहता है। शहर मरते हैं, गांव नहीं। अमर्त्य सेन की स्थापना है कि दुनिया की असल पूंजी केवल दो है- जमीन और जानवर। मुद्रा तो मान्यता पर जी रही है। मान्यता खत्म, तो उस नोट से ठोंगा भी नहीं बनाया जा सकता। लेकिन जमीन ऊसर होने के बावजूद अपनी उर्वरा शक्ति को फिर से पा सकती है। इसलिए किसान जान दे देगा, जमीन नहीं देगा। यह उसका जमीर है।
चंचल की फेसबुक वॉल से

 

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