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विरासत संवारने और बिगाड़ने वाले

हर देश या समाज को सांस्कृतिक धरोहरों की जरूरत होती है, लेकिन अलग-अलग रूप में। जरूरत उन देशों को तो है ही, जो प्राचीन सभ्यताओं के केंद्र माने जाने के कारण महत्वपूर्ण रहे हैं, जैसे सीरिया, इराक, अफगानिस्तान, भारत, म्यांमार, श्रीलंका, चीन; जरूरत उन देशों को भी है, जिनका अब तक कोई उल्लेखनीय अतीत नहीं माना जाता रहा है, बल्कि उनको औपनिवेशिक शासन से पैदा हुआ माना जाता है, जैसे- सिंगापुर, मॉरीशस और सूरीनाम। ऐसे राष्ट्र अपने विकास व संपन्नता के लिए औपनिवेशिक दौर को ही सारा श्रेय देने की सोच से बाहर आना चाहते हैं। इनमें से कई देश औपनिवेशिक दौर से पहले की अपनी जड़ें खोज रहे हैं, इस सोच के साथ कि उनका अतीत किसी न किसी तरह से समृद्ध रहा था।

इसका एक अच्छा उदाहरण है सिंगापुर। यह माना जाता है कि सिंगापुर पहले मछुआरों का एक छोटा-सा गांव भर था। अंग्रेजों के आने के बाद यह बंदरगाह के रूप में विकसित हुआ। इसकी संपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर अंग्रेजों के सिंगापुर में आने के बाद की मानी जाती रही है। लेकिन अब सिंगापुर उस दौर से पहले की अपनी विरासत को खोजने में लगा हुआ है। यह सिद्ध करने की कोशिशें चल रही हैं कि यह द्वीप 12वीं सदी के आसपास भी एक विकसित बंदरगाह वाला शहर था। इसे साबित करने के लिए कहीं खुदाई का सहारा लिया जा रहा है, तो कहीं दूसरे सुबूत ढूंढे़ जा रहे हैं। सिंगापुर ही नहीं, मॉरीशस व सूरीनाम जैसे देश भी यही कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, ऐसे भी देश हैं, जो पहले से ही प्राचीन सभ्यताओं के केंद्र माने जाते हैं, वे भी अपनी सभ्यता को फिर से आविष्कृत करके यह साबित करने पर तुले हैं कि उनकी जड़ें और पुरानी हैं। वे अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को लगातार विकसित करते हुए पर्यटन बाजार के लिए आर्कषक बनाना चाहते हैं। इससे उनके यहां सेवा क्षेत्र में अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। पर्यटन के नए बाजार में जो जितना पुराना है, उसकी उतनी ही ज्यादा पूछ है। लेकिन दुनिया के कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां इसका एकदम उल्टा हो रहा है। और यह पूरी दुनिया के लिए एक नए तरह का संकट भी पैदा कर रहा है।

कुछ ऐसे देश भी हैं, जहां रूढि़वादी ताकतें ऐतिहासिक इमारतों, कलाकृतियों को नष्ट करने में लगी हुई हैं। इस संकट के सूत्रधार हैं लगातार विकराल हो रहे तालिबान, इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया व बोको हराम जैसे संगठन। ये सभी संगठन इराक, सीरिया, अफगानिस्तान व कई अन्य देशों की सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट करने में लगे हुए हैं। दुनिया के जिन भी देशों में इन संगठनों का आधार और ताकत बढ़ी है, वे सांस्कृतिक धरोहरों के ध्वंस की समस्या से जूझ रहे हैं। इनके आगे कई देशों की सरकारें बेबस हैं, यूनेस्को जैसे संगठन भी कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं, जो विश्व विरासत को बचाने के लिए पिछले कुछ समय से ज्यादा सक्रिय हैं। अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की विशालकाय मूर्तियों को पिछले दशक में तालिबान आतंकियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। दक्षिण एशिया की बौद्धिक संरचना में बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है, जो किसी भी सार्वजनिक विमर्श में असंतुष्ट आवाज को जगह देने के लिए जाना जाता रहा है। महात्मा बुद्ध दूसरों की आवाज सुनने के हिमायती थे। वह समाज में बराबरी और करुणा के आधार पर उसका पुनर्गठन भी चाहते थे। बुद्ध की मूर्तियां उस इलाके के एक ऐसे इतिहास का हिस्सा थीं, जो यह सिद्ध करता है कि वहां पर अन्य धार्मिक समूह पूरे सम्मान के साथ कई सदियों तक मौजूद रहे थे। तालिबानी शासन इसे मिटाकर उस अतीत की पुनर्संरचना करना चाहता था, जो उसकी विचारधारा के मुफीद साबित होता। इसके बाद तो ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट करने का एक सिलसिला ही चल पड़ा है। काबुल संग्रहालय, इराक का मोसुल संग्रहालय, जो कि मेसोपोटामिया की सांस्कृतिक धरोहरों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है, और सीरिया के चर्च, मस्जिद इत्यादि अतिवादियों के निशाने पर हैं।

अभी हाल ही में उनके निशाने पर सीरिया का पामाइरा शहर आ गया। लगभग दो हजार साल पुराना यह शहर अपनी रोमन शैली की इमारतों और खुले प्रेक्षागृहों यानी स्थापत्य के लिए मशहूर रहा है। इसकी सांस्कृतिक विरासत को यूनेस्को ने विश्व धरोहर के रूप में मान्यता भी दे रखी है। आतंकियों को यह शहर ईसाई वास्तुकला के प्रभाव में लगता था। वे इसे इस्लामी रूप देने के लिए इसके विध्वंस तक पर उतर आए हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले आतंकियों ने पामाइरा के खुले प्रेक्षागृह में 20 लोगों को फांसी पर लटका दिया। इस जगह का चुनाव उन्होंने सोच-समझकर किया कि ईसाई वास्तुकला की विरासतों से वहां की रहने वाली जनता तौबा कर ले।

इस धार्मिक रूढि़वाद के साथ एक आर्थिक सोच भी काम कर रही है। सांस्कृतिक धरोहरों, संग्रहालयों को धन का नया स्रोत समझा जा रहा है। दूसरी तरफ, उनके विनाश के तुरंत बाद भूमि, शहर, गैस, तेल के कुओं पर कब्जा जमाना भी उनका उद्देश्य है। सिर्फ सीरिया में 95 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को आतंकी समूहों ने अपने कब्जे में ले लिया है। वस्तुत: ये अतिवादी समूह इन प्राचीन धरोहरों को नष्ट करके इन देशों में, बौद्ध,  हिंदू, या ईसाई सभ्यताओं के प्रमाण मिटा देना चाहते हैं। इनके स्थान पर वे किसी देश की इस्लामी अतीत वाली एकमात्र छवि गढ़ना चाहते हैं। वे मानते हैं कि इन राष्ट्रों को इस्लामी राज्य बनाने के लिए जरूरी है कि यहां 'एक ही इतिहास जिए।' एक ही अतीत, जो इस्लामी अस्मिता की कहानी कहे, और वही कहानी कही, सुनी व देखी जाए।
दूसरा, इन प्राचीन सभ्यताओं की मूर्तियों का नाश करके वे इसे इस्लाम की 'बुत पूजा' के विरोध की व्यवस्था से जोड़ना चाहते हैं, ताकि वे अपने को मूल इस्लामवादी साबित कर इन देशों के शासकों की आधुनिकता को गैर-इस्लामी साबित किया जा सके। यही नहीं, प्राचीन स्थलों की खुदाई से मिले और इन संग्रहालयों में संरक्षित सोने, चांदी के आभूषणों और अस्त्र-शस्त्रों पर कब्जा कर उन्हें अपनी युद्ध अर्थव्यवस्था के स्रोत के रूप में विकसित करना चाहते हैं। विडंबना यह है कि सीरिया और कई अन्य देशों के सांस्कृतिक और राजनीतिक हालात का यह बुरा दौर कलाकृतियों के संग्राहकों, तस्करों व एजेंटों के लिए  एक अच्छा दौर साबित हो रहा है। एक तरफ राष्ट्र और राष्ट्रीय सत्ताएं अपनी सांस्कृतिक धरोहरों से अपनी अस्मिता रच रही हैं, साथ ही विकसित हो रहे नए पर्यटन बाजार से इन्हें जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, तो वहीं इस्लामी आतंकी एकमात्र 'इस्लामी अतीत' को जिंदा रखना चाहते हैं, उससे इतर अतीत की वे हत्या करने में जुटे हैं। इनमें से कुछ का, जिन्हें छिपाकर विश्व कला बाजार में बेचा जा सकता है, लाखों-करोड़ों डॉलर में सौदा करके वे अपने युद्ध का खर्च भी जुटा रहे हैं। विनाश के इस दौर में यूनेस्को जैसी संस्थाएं भी कुछ नहीं कर पा रहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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