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अच्छे नंबरों और अच्छे कॉलेज में फंसी शिक्षा

सवेरे के नौ बजे होंगे कि फोन की घंटी बजी। उधर कृति थी। मैंने खुश होकर पूछा- अरे कृति कैसी हो? रिजल्ट कैसा रहा? उधर से बहुत उदासी भरी आवाज सुनाई दी- ठीक है आंटी। उसकी उदासी से बहुत अचरज हुआ, क्योंकि वह बहुत होशियार लड़की है, न केवल पढ़ाई में, बल्कि दूसरी एक्टिविटीज में भी। हॉकी की अच्छी खिलाड़ी है। समझ में नहीं आया कि बात आगे कैसे बढ़े। मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा- लगता है सवेरे-सवेरे मजाक का मूड है। बताओ नंबर कैसे आए? मेरी बात उसने सुनी भर कि उसकी सिसकियां सुनाई देने लगीं। रोना सुनकर विश्वास होने लगा कि इसके साथ ऐसा कुछ हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था। कहीं फेल तो नहीं हो गई?

मैंने कहा- कृति क्या हुआ, बताओ तो? वह बोली- मेरे 96 परसेंट नंबर ही आ पाए, अच्छी जगह दाखिला नहीं मिलेगा। 96 परसेंट और यह रोना? यह पूछ पाती कि इसके पहले ही उसका फोन कट गया था। सोचने लगी कि अगर 96 प्रतिशत आने पर भी कोई बच्चा रो रहा है, तो उन बच्चों की हालत क्या होगी, जिनके साठ या उससे कम प्रतिशत अंक आए हैं? उन्हें कहां दाखिला मिलेगा? वे कहां जाएंगे? क्या इसे हमारे शिक्षा विभाग व शिक्षा पंडितों की सफलता मानेंगे कि बच्चे पास होते हैं, ठीक-ठाक नंबर भी ले आते हैं, मगर आगे दाखिला पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते हैं। इन बच्चों में से कई के परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं कि वे मोटी फीस देकर निजी संस्थानों में दाखिला ले सकें।

एक तरफ नारा चलता है कि सब पढ़ें, सब बढ़ें, मगर कैसे? जितने बच्चे हर साल पढ़ने के लिए निकलते हैं, उनमें से कितनों को आगे दाखिला मिल पाता है? मनपसंद सब्जेक्ट और कॉलेज की तो बात ही छोडि़ए। जब यह कानून बनाया जाता है कि आठवीं तक किसी भी बच्चे को फेल नहीं किया जाएगा, तब यह क्यों नहीं सोचा जाता कि आगे जाकर क्या इतने स्कूल-कॉलेज हैं कि सब बच्चे पढ़ सकें? जब आठवीं तक किसी को फेल न करने का नियम बना था, तब कई जगहों से ऐसी खबरें आई थीं कि बच्चों ने पढ़ना और अध्यापकों ने पढ़ाना ही छोड़ दिया। जब फेल होना ही नहीं, तो पढ़ें क्यों? शायद इसी कारण से सरकार को इस नियम पर फिर से विचार करना पड़ा है। जब तक चुनौती न हो, तब तक कोई मेहनत करने के लिए प्रेरित नहीं होता।

लेकिन इसके आगे की चुनौती ज्यादा बड़ी है। हर साल बहुत अच्छे अंक आने के बावजूद बच्चों को दाखिले के लिए काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है, परेशानी झेलनी पड़ती है। लेकिन शिक्षा नीति और शिक्षा सुधार की बात करने वाले इसके लिए कुछ नहीं करते। दूसरी समस्या यह है कि अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता। कॉलेज-कॉलेज का यह वर्गभेद क्यों है? ऐसे कॉलेज हैं ही क्यों, जो अच्छे नहीं हैं? क्या उन्हें सचमुच अच्छा नहीं बनाया जा सकता? इन सवालों के जवाब ढूंढ़ता कोई नहीं दिख रहा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:अच्छे नंबरों और अच्छे कॉलेज में फंसी शिक्षा