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उनके मुख से झरे फूलों की परंपरा

मौसम गरमी के रोज नए से नए रिकॉर्ड बना रहा है। उसने जाड़े में भी ऐसा ही किया था। रिकॉर्ड बनाकर रिकॉर्ड तोड़ना मौसम का प्रिय शगल है। कोई बता रहा था कि रिकॉर्ड तो बनते ही टूटने के लिए हैं। हम अब तक यह भ्रम पाले थे कि रिकॉर्ड संजोकर रखने के लिए होते हैं। उनसे ही आखिर इतिहास और प्रभामंडल रचे जाते हैं।

'यूपी' के एक मंत्री जी ने बुलेट ट्रेन की गति से चुनिंदा गालियां दीं। वे सब रिकॉर्ड हुईं। मंत्री जी ने तीन मिनट में 152 गालियां दीं, यानी एक मिनट में 50 गालियां मानी जाएं, तब भी दो गालियां वक्त-जरूरत के लिए बची रहें। उससे भी बड़ी बात यह है कि एक अखबार ने उन सभी गालियों को अक्षरश:छाप डाला और अखबार ने उस दिन बिक्री का नया कीर्तिमान रच दिया। इससे यह पता लगता है कि जो गालियां द्रुत गति और उपयुक्त विशेषणों के साथ परोसी जाती हैं, उनका आगे का बाजार भी काफी अच्छा है।
धंधे का उसूल है कि जो बिक पाए, वही बाई डिफॉल्ट सर्वोत्तम मान लिया जाता है। अब तक धारणा यह थी कि गंभीर साहित्य केवल रचनाकार द्वारा धारित पदनाम, ओहदे की धमक, जेब की खनक, दैहिक प्रसंगों की चाशनी में पगे आख्यान और रचियता के जीवन से जुड़े अवांतर प्रसंगों के हिसाब से बिकता है। मंच पर धर्मनिरपेक्षता के बरक्स सेकुलरिज्म का खोमचा खूब जमता है। चुटकुलों की भी श्रोताओं की ओर से 'वन्स मोर' की डिमांड रहती है। खचाखच भरा पंडाल देशभक्ति से भरपूर विमर्श और चुटकुलों को समभाव से सुनता, गुनता और सराहता है। वैसे भी अपने कलेवर में देशभक्ति की अतिरंजित अभिव्यक्ति चुटकुलों-सा लोकरंजन करती है।

गालियां हमारे महान मुल्क की महान सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये वाचिक परंपरा की थाती हैं। यह एक कालजयी कला है। इसके रचयिता जानते हैं कि कब, कहां, कैसे, किसको और कैसी गाली दी जाए। गाली हमेशा सामने वाले का शारीरिक सौष्ठव और उसकी भुजाओं की ताकत को परखकर दी जाती है। बहुत से लोग अपनी जिंदगी में इसी से रंग भरते हैं। भले ही वे इनका इस्तेमाल अकेले में ही करते हों।

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  • Web Title:उनके मुख से झरे फूलों की परंपरा