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कबीर का घर

आम तौर पर कबीर के जिस घर से हमारा परिचय है, उसे वह जला देना चाहते हैं। वह केवल अपना घर नहीं जलाते हैं, बल्कि उनका घर भी जला देना चाहते हैं, जो उनके साथ चलना चाहता है। घर को जला देना कबीर के साथ चलने की पूर्व शर्त है। यदि आप कबीर के साथ चलना चाहते हैं, तो पहले अपना घर जला दें।

सच बात यह है कि आज 617 साल बाद भी कबीर के साथ चलने के लिए बहुत सारे लोग तैयार रहते हैं। अपना घर जलाने और कबीर के साथ चल पड़ने वाले लोगों की कमी नहीं है। कबीर के साथ चलने को तैयार लोगों का रेंज बहुत व्यापक है। ऐसे लोगों को कबीर कहां ले जाना चाहते हैं, कहां ले जाते हैं? इसी के साथ सवाल यह भी है कि कबीर के साथ जाने के लिए लोग क्यों तैयार हैं?

घर से आदमी का बड़ा पुराना नाता है। घर के बिना आदमी का काम नहीं चलने वाला। कबीर का भी। कबीर घर केवल जलाते नहीं हैं, घर बनाते भी हैं। अवधू गगन मंडल घर कीजै, अमृत झरै सदा सुख उपजै, बंकनालि रस पीजै। यानी घर से अमृत बरसे और सुख मिलता रहे, तो कबीर को करने में ऐतराज नहीं है। घर की प्रकृति भिन्न है। अमृत बरसता हो, निरंतर सुख उपजता हो, तो कबीर घर की रखवाली के लिए भी प्रस्तुत हैं। इस तरह देखें, तो कबीरदास के यहां दो तरह के घर हैं। एक वह, जो आदमी को छोटा और संकीर्ण बनाता है, तो दूसरा वह, जो उसे बड़ा और उदात्त मनुष्य बनाता है। कबीर कहते हैं कि यह घर प्रेम का है, खाला का नही। अहंकार का भेद बुद्धि का सिर उतारकर बाहर रख देना है, तब जाकर प्रेम के घर में मनुष्य प्रवेश कर पाएगा। प्रेम का यह घर ऐसा है, जिसमें अपना सब कुछ देकर सब कुछ को दांव पर लगाकर ही प्रवेश मिल सकता है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है।

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