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नेताओं की मौत और साजिश की कहानियां

तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता की मौत को लेकर एक रहस्य बना हुआ था। मद्रास उच्च न्यायालय ने इस पर चिंता जाहिर कर इस विवाद को और तेज कर दिया है। अन्नाद्रमुक के एक कार्यकर्ता पी जोसेफ की जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति वैद्यलिंगम ने टिप्पणी की कि मीडिया में उनकी मृत्यु से संबंधित जो खबरें आई हैं, उनसे संदेह पैदा होता है, और व्यक्तिगत रूप से उन्हें भी संदेह है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि क्यों न जांच के लिए उनके शव को खोदकर बाहर निकाला जाए। उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी पर अन्नाद्रमुक की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से काफी तीखी है।

यह माना जाता है कि इस तरह की गोपनीयता सियासी दलों के अंदर दरअसल लोकतंत्र के अभाव के कारण है। अधिनायकवादी तरीके से जब पार्टियां चलाई जाती हैं, तो पारदर्शिता के लिए कोई स्थान नहीं बचता। कम्युनिस्ट देशों में इसी तरह की गोपनीयता हमेशा बनी रहती थी और किसी खास नेता के स्वास्थ्य को लेकर अफवाहें उड़तीं, तो यह पूछा जाता था कि उन्हें अंतिम बार सार्वजनिक रूप से कब देखा गया? सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन की मौत को लेकर रहस्य काफी दिनों तक बना रहा। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें ऑस्टीरियो-स्क्लीरोसिस हो गया था और कहा जाता है कि इस कारण उन्हें बहुत गुस्सा आने लगा था। कहते हैं कि जब उनके निजी डॉक्टर ने उन्हें सलाह दी कि वह गुस्सा न करें, तो उन्होंने उसे गिरफ्तार करवा दिया। 1952 में कई अन्य डॉक्टरों को भी गिरफ्तार किया गया, जिनमें बहुत से यहूदी थे। समाचार पत्रों में उन डॉक्टरों के विरुद्ध एक अभियान चला-‘सफेद लिबास में हत्यारे’। इससे अफवाह उड़ी कि स्टालिन की मौत डॉक्टरों के षड्यंत्र के कारण हुई।

दुनिया भर के कई नेताओं की मौत पर विवाद रहा है। ऐसा ही भारत के कई नेताओं को लेकर भी है। इनमें सबसे प्रमुख है सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु। दावा यही किया गया है कि 18 अगस्त, 1945 को फॉर्मोसा में एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया। आज तक इसे पूरी तरह स्वीकारा नहीं जा सका और तीन जांच आयोगों की रिपोर्ट आने के बाद भी उनकी मौत की गुत्थी नहीं सुलझ पाई है। उनके सहयोगी कैप्टन अब्बास अली ने यहां तक बताया था कि उस कथित दुर्घटना के बाद सितंबर के पहले सप्ताह में बोस ने सिंगापुर में जवानों को संबोधित किया, जिसमें वह (कैप्टन अली) भी मौजूद थे। कहा जाता है कि वह छिपकर सोवियत संघ चले गए थे, जहां बाद में स्टालिन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और फांसी दे दी।

लालबहादुर शास्त्री की मौत भी रहस्यों में घिरी है। ताशकंद में उनकी मौत हुई थी। सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने कहा कि उनका शरीर नीला पड़ गया था और शरीर पर कई जगह कटे के निशान थे। उनका कोई पोस्टमाटर्म भी नहीं किया गया- न ताशकंद में और न भारत में। उनके पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उनके चश्मे के खोल से एक स्लिप मिली थी, जिस पर उन्होंने स्वयं लिखा था कि लगता है, दूध में जहर मिला दिया गया है और वह शायद वापस न आ पाएं। उनके साथ गए निजी चिकित्सक आरएन चुग की बाद में तब सड़क दुर्घटना में मौत हो गई, जब वह समिति के समक्ष गवाही देने जा रहे थे। शास्त्री जी के निधन के 13 दिन बाद होमी जहांगीर भाभा की मृत्यु एक विमान हादसे में हुई। वह भारत को परमाणु शक्ति बनाना चाहते थे।

सीआईए के योजना निदेशक रॉबर्ट टी क्रॉली ने पत्रकार ग्रेगरी डगलस को बताया कि सीआईए ने शास्त्री और भाभा दोनों की हत्या की। क्रॉली ने यह भी कहा था कि उनका साक्षात्कार उनकी मौत के बाद प्रकाशित किया जाए। जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत कश्मीर में संदिग्ध हालत में हुई। जनसंघ के ही तत्कालीन अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की भी हत्या हुई। इस सब पर विवाद बना हुआ है। और तो और, इंदिरा गांधी की हत्या को भी कुछ लोग एक बड़े विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा मानते हैं। संजय गांधी की मौत पर भी कई सवाल खड़े हुए थे। अक्सर कहा जाता है कि नेता चले जाते हैं और अपने पीछे षड्यंत्र की कहानियां छोड़ जाते हैं। ये ऐसी पहेलियां हैं, जो कभी नहीं सुलझतीं। जयललिता की पहेली भी इसी कड़ी में जुड़ जाएगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:stories of death and conspiracy of leaders