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न को हां कहें

भले ही हम इस पर यकीन न करें, लेकिन कई बार आप किसी को न कहकर भी उसकी नजरों में ऊंचे उठ जाते हैं। जैसे-जैसे हम उस दुनिया की ओर बढ़े, जहां न का मतलब सिर्फ नकार था, हमने बस हां कहने की आदत विकसित कर ली। बस हां और हां। लेकिन एक गंभीर, बेलौस, बेलाग-लपेट जिंदगी जीनी है, तो हां के साथ-साथ नहीं कहना भी सीखना जरूरी है।

सोलोमन एश अमेरिकी मनोविज्ञानी रहे हैं। उन्होंने अ रिफॉर्मूलेशन ऑफ द प्रॉब्लम ऑफ एसोसिएशन  जैसी किताब लिखी है। वह कहते हैं- हां बोलना यह दिखाता है कि हमारी पक्षधरता सामने वाले के साथ है। हमें ऐसा ही सिखाया गया है, कभी अनुशासन, तो कभी किसी और बहाने। जब हम हां कह रहे होते हैं, तब अगर हमारा दिमाग न कह रहा होता है, तो हमारे भीतर दो परस्पर विरोधी चीजें गुत्थ्मगुत्था हो जाती हैं। और यह बात हमारे विकास, हमारी कार्यक्षमता के लिए खतरनाक हो जाती है।

हां कहने की समस्या सबसे ज्यादा कॉरपोरेट जगत में है। जो भी काम मिले, हां कहो, नहीं तो अच्छा नहीं समझा जाएगा। इस धारणा की जड़ें बहुत ही गहरी हैं। यहां रिचर्ड ब्रेनसन की बातें गौर करें। रिचर्ड ऐसे व्यवसायी हैं, जिनका काम के प्रति एक अलग दर्शन है। रिचर्ड कहते हैं कि मैं अपने वर्कर से कभी अपेक्षा नहीं रखता कि वे किसी काम के लिए बस हां कहेंगे। हां, जो हां कहते हैं, मैं काम उन्हें सौंपता हूं, पर यह भी ध्यान रखता हूं कि जो इस काम को न कह रहा है कि उसकी हां वाली जगहें कौन सी हैं। मैं जानता हूं कि वहां वे असली उत्पादक हैं। 

ब्रेनसन जानते हैं कि जो अपनी प्रतिबद्धता को समझते हैं, वे वही काम करते हैं, जो उनके लिए होता है। बाकियों के लिए उनके पास न ही होती है। आप अगर न नहीं कह पाते, तो अभ्यास करें। सामने वाले को समझाएं कि न कहने की वजह क्या है? यकीनन वे समझ जाएंगे। 
प्रवीण कुमार

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