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विमर्शराजफाश की राजनीति और नेताजी

लाइव हिन्दुस्तान टीम
Sun, 24 Jan 2016 09:52 PM
राजफाश की राजनीति और नेताजी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ीं 100 फाइलें सार्वजनिक की गई हैं, और कहा गया है कि अब हर महीने उनसे जुड़ीं लगभग 25 फाइलें सार्वजनिक की जाएंगी। यह अच्छी बात है। अगर कोई भी फाइल सार्वजनिक की जाती है, तो बतौर इतिहासकार मैं उसका स्वागत करूंगी।

मगर इस एक घटना से कहीं ज्यादा बड़ा मुद्दा है, इतिहासकारों के लिए 'डीक्लासिफिकेशन' या आर्काइव का खुलना। यह हमारे पूरे तंत्र की कमजोरी रही है कि आजादी के बाद की तमाम फाइलें सार्वजनिक नहीं हो सकी हैं, जबकि उनको अब तक सार्वजनिक हो जाना चाहिए था। असल में, हमारे देश में डीक्लासिफिकेशन को लेकर दो कानून हैं। पहला, आर्काइव ऐक्ट, जिसके तहत कोई भी फाइल 30 साल के बाद डीक्लासिफाई हो जानी चाहिए। दूसरा है सूचना का अधिकार, जिसमें किसी भी सूचना के सार्वजनिक होने पर अधिकतम 20 साल तक की बंदिश रखी गई है। इस लिहाज से देखें, तो हमारे देश में कोई भी फाइल 30 वर्षों के बाद स्वत: सार्वजनिक हो जानी चाहिए। मगर क्या वाकई ऐसा होता है?

ब्रिटेन इस मामले में आदर्श देश है। वहां अधिकतम 30 वर्षों तक ही फाइलों को गोपनीय रखने का कानून है। जैसे ही यह समय-सीमा समाप्त होती है, सारी फाइलें स्वत: सार्वजनिक कर दी जाती हैं; यहां तक कि 'कैबिनेट नोट' भी। इसलिए हर साल पहली जनवरी को वहां पर नेशनल आर्काइव के बाहर स्कॉलरों की लाइन लगी रहती है। वहां इसके लिए न तो कोई विरोध-प्रदर्शन होता है, और न ही किसी को कोई आंदोलन करना पड़ता है। इस तरह का कानून अपने यहां होने पर भी कई कारणों से, जिनमें कई बार तो श्रम बल की कमी का रोना रोया जाता है, गोपनीय फाइलें सार्वजनिक नहीं होतीं। यहां सवाल सिर्फ सुभाष चंद्र बोस का नहीं है।

उन्हें लेकर इस तरह बहस हो रही है, मानो सिर्फ उन्हीं से जुड़ी फाइलें सरकार दबाए बैठी है, और बाकी सारी फाइलें सार्वजनिक कर दी गई हैं। क्या जवाहरलाल नेहरू के पूरे कार्यकाल की फाइलें सार्वजनिक हुई हैं? क्या आपातकाल से जुड़ीं तमाम फाइलें हमारे सामने हैं, जबकि कानूनन वे स्वत: डीक्लासिफाई हो जानी चाहिए थीं। मुद्दा यह नहीं है कि वे सूचनाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सवाल यह है कि अधिकतम 30 साल की बंदिश के बाद भी हमारे यहां सभी फाइलें सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही हैं? कोई इसका यह अर्थ न लगाए कि सरकार जान-बूझकर सूचनाएं दबाती है, बल्कि मेरा मानना है कि इतिहास या इतिहास के कार्य या तंत्र की पारदर्शिता के प्रति बेरुखी के कारण ऐसा हो रहा है। इसलिए इस मुद्दे को सिर्फ नेताजी तक नहीं समेटना चाहिए, बल्कि डीक्लासिफिकेशन को लेकर हमें अपनी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है।

रही बात सुभाष चंद्र बोस की, तो जितनी भी सूचनाएं इस डीक्लासिफिकेशन के माध्यम से सामने आई हैं, उनमें कुछ भी नया नहीं दिख रहा। हां, इसमें 1995 के केंद्रीय कैबिनेट का एक नोट है, जिसमें सुभाष चंद्र बोस की मौत की वजह हवाई दुर्घटना मानी गई है। इसके अलावा एक और सूचना है कि सुभाष चंद्र बोस की पत्नी को आर्थिक मदद देने की पेशकश सरकार ने की थी, जो बाद में उनकी बेटी को दी जाती रही। इन दोनों सूचनाओं के अलावा बाकी तमाम जानकारियां, जिनमें समर गुहा या अमिय बोस की चिट्ठियां भी हैं, नई नहीं हैं। बेशक कुछ लोग नेताजी की मौत पर सवाल उठाते रहे हैं। हम उन्हें ऐसा करने से रोक भी नहीं सकते। मगर इन संदेहों के पीछे कोई ठोस तर्क तो हो? यहां नेताजी की बेटी अनीता बोस के शब्द काफी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा है- हिन्दुस्तान के साथ सुभाष चंद्र बोस का जैसा लगाव था, उसे देखते हुए मैं यह विश्वास नहीं कर सकती कि अगर वह जिंदा होते, तो कहीं और रहते या फिर गुमनामी बाबा बनकर छिपकर बैठ जाते। ऐसी अफवाहें फैलाना उनका अपमान करना है।

मेरा मानना है कि अब तक जो फाइलें सार्वजनिक की गई हैं, उनके आधार पर सुभाष चंद्र बोस को देखने या उनके व्यक्तित्व के विश्लेषण का नजरिया नहीं बदलने वाला। बीते साल सितंबर महीने में ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बोस से जुड़ी करीब 60 फाइलों को सार्वजनिक किया था। उन फाइलों के विश्लेषण हो चुके हैं। क्या कोई नई सूचना हमारे सामने आई? इसी तरह, शनिवार को भी जो फाइलें सार्वजनिक की गई हैं, उनसे ऐसी कोई सूचना सामने नहीं आ रही, जो सुभाष बाबू के व्यक्तित्व को लेकर नई समझ पैदा करे या इतिहास पर कोई बड़ा असर डाले। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिसंबर, 1945 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को लिखी कथित चिट्ठी भी, जिसमें नेताजी को युद्ध अपराधी कहा गया है, काफी पहले से सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। दरअसल, इन सबके बहाने एक उन्माद फैलाने की कोशिश हो रही है, जिसे रोकना अनिवार्य है। इससे भले ही फौरी राजनीतिक हित सध जाएं, मगर नेताजी से जुड़ी गंभीर सूचनाएं सामने नहीं आ रही हैं।

हमें अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने की जरूरत है। अमर्त्य सेन के शब्दों में कहूं, तो हम सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के बारे में ही क्यों बात करते हैं? उनके जीवन व कर्म की बात क्यों नहीं करते? क्या यह विडंबना नहीं है कि नेताजी के जन्मदिन पर उनके जीवन और नजरियेे पर बात करने की बजाय उनकी मौत पर चर्चा हो रही है? नेताजी समानता में विश्वास करते थे। उनका राजनीतिक-आर्थिक व सामाजिक नजरिया स्पष्ट था। वह सांप्रदायिकता के घनघोर विरोधी थे। क्या आज के हालात उनके विचार से मेल खाते हैं? जिस तरह नेहरू की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, उसी तरह नेताजी की धर्मनिरपेक्षता पर भी कोई शक नहीं है। बेशक हिटलर से मदद मांगने या फासिज्म में अच्छाई होने संबंधी उनके कुछ बयान हैं, मगर सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनके विचार बिल्कुल स्पष्ट हैं।

लिहाजा चर्चा नेताजी के योगदान, उनके दृष्टिकोण और सोच पर होनी चाहिए। यहां मुझे नेताजी के उस भाषण की याद आ रही है, जो उन्होंने रंगून में आजाद हिंद फौज रेडियो पर तब दिया था, जब आईएनए भारत की ओर बढ़ने वाली थी। उन्होंने गांधीजी को संबोधित करते हुए उन्हें 'फादर ऑफ द नेशन' यानी राष्ट्रपिता बताया था और आईएनए के सैनिकों से कहा था कि जब भी आप भारत की सीमा में दाखिल होंगे, आपका 'कमांडर इन चीफ' मैं नहीं रहूंगा, बल्कि गांधीजी रहेंगे। ये सारी बातें उन्होंने तब कहीं, जब सबको पता था कि गांधी और उनमें कितने मतभेद हैं।
एक इतिहासकार के नाते मेरी चिंता इसी से जुड़ी है। स्वतंत्रता संग्राम के बड़े-बड़े नेताओं में भले ही कितने राजनीतिक मतभेद रहे हों, मगर उससे उनके निजी संबंधों में खटास नहीं आ पाई। वे एक-दूसरे का भरपूर सम्मान किया करते थे। एक-दूसरे की मदद करते थे। मगर आज यह भावना खत्म-सी हो गई है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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